Friday, 8 April 2011

अन्ना-मनमोहन का 15 मिनट का संवाद !




सिर्फ पन्द्रह मिनट की बातचीत ने ही अन्ना हजारे और प्रधानमंत्री के बीच लकीर खींच दी। मामला भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का था। और उस पर लोकपाल विधेयक के उस मसौदे को तैयार करने का था, जिससे आम लोगों का संस्थाओं पर से उठता भरोसा दोबारा जागे। 15 मिनट की बाचतीच कुछ इस अंदाज में हुई-
सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना चाहती है और इसमें आपकी मदद चाहिये। हम तो तैयार हैं। हमने यही लड़ाई लड़ी है। लोकपाल विधेयक के जरीये यह काम हो सकता है, आप हमें बतायें उसमें कैसे आगे बढ़ें, जिससे सहमति बने और विधेयक अटके भी नहीं। प्रधानमंत्री जी जब तक इसके दायरे में हर संस्था नहीं आयेगी और जब तक कार्रवाई करने के बाद परिणाम जल्द से जल्द सामने लाने की सोच नहीं होगी, तब तक लोकपाल का कोई मतलब नहीं है। क्या आप चाहते है कि जो स्वायत्त संस्थाये हैं, उन्हे भी इसके दायरे में ले आयें। जी , बहुत जरुरी है। जैसे सीबीआई एक स्वायत्त जांच एजेंसी है लेकिन उसपर किसी का भरोसा नहीं है और सत्ता अपनी अंगुली पर उसे नचाती है और वह ना नाचे तो फिर सीबीआई के बाबुओं की भी खैर नहीं। चलिये ठीक है, लेकिन इसपर सरकार के भीतर भी तो सहमति बननी चाहिये। और सरकार के आठ मंत्री बकायदा भ्रष्टाचार को लेकर मसौदा तैयार कर रहे हैं । तो उन्हे प्रस्ताव तैयार करने दिजिये और आप अपने सुझाव दे दीजिये। नही, प्रस्ताव तैयार करने में सरकार के बाहर जनता की भागेदारी भी होनी चाहिये। तभी पता चलेगा कि सरकार से बाहर लोग क्या सोचते है और भ्रष्टाचार की सूरत में सत्ता में बैठे लोगो के खिलाफ कैसे कार्रवाई हो सकती है। लेकिन मंत्री भी तो जनता के ही नुमाइन्दे हैं । और आप अलग से जनता के नुमाइन्दों को कहां से लायेंगे। नुमाइन्दी का मतलब सिर्फ संसदीय चुनाव नहीं होता । शांतिभूषण जी कानून मंत्री रह चुके हैं और उन्होने सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्टाचार तक पर अंगुली उठायी। जनता भी सोचती थी कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर किस दिन कौन कहेगा। सरकार के तो किसी मंत्री ने कुछ नहीं कहा। लेकिन शांतिभूषण जी ने ताल ठोंककर कहा। तो इस तरह जो लोग अलग अलग क्षेत्रों से जुड़े हुये हैं और लोगों की भावना के करीब हैं, उन्हे लोकपाल विधेयक के मसौदे को तैयार करने में जोड़ा जायेगा। और अपन का तो मानना है कि प्रस्ताव तैयार में आधे सरकार के मंत्री हो और आधे असल जनता के नुमाइन्दे, जो उन सवालो को उठा रहे हैं, जिस पर से सत्ता ने आंखे मूंदी हुई है। यह कैसे संभव है। जब देश के आठ वरिष्ठ मंत्री भ्रष्टाचार को रोकने के लिये बनी कमेटी में काम कर रहे हैं तो उनके बराबर कैसे किसी को भी अधिकार दिये जा सकते हैं। प्रधानमंत्री जी आपको याद होगा जब जवाहरलाल नेहरु मंत्रिमंडल बना रहे थे और तमाम कमेटियां बनायी जा रही थी, तब महात्मा गांधी ने नेहरु से एक ही बात कही थी कि आजादी समूचे देश को मिली है सिर्फ कांग्रेस को नहीं। और यह बात लोकपाल विधेयक को लेकर भी समझनी चाहिये क्योंकि भ्रष्टाचार का मामला समूचे देश का मुद्दा है , यह सिर्फ सरकार का विषय नहीं है। लेकिन सरकार और मंत्री की जवाबदेही तो जनता के प्रति ही होती है। फिर आप गृहमंत्री, वित्तमंत्री, कानून मंत्री,कृषि मंत्री , मानव संसाधन मंत्री ,रेल मंत्री,रक्षा मंत्री से लेकर पीएमओ के मंत्री तक पर भरोसा क्या नहीं कर सकते।

हम इसकी व्यवस्था कर देते है कि चार मंत्री बकायदा आप लोगो के विचारो से लगातार अवगत होते रहे। और लोकपाल का स्वरुप भी उसी अनुकूल हो जैसा आप चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी यह कैसे संभव है। देश का समूचा कच्चा-चिट्ठा तो आपको भी सामने है। आप ही जिन मंत्रियो के जरीये लोकपाल या भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की बात कह रहे है, जरा उसकी तासिर तो देखिये। गृह मंत्री पी चिदबंरम का नाम विकिलीक्स खुलासे में आया कि कैसे शिवगंगा में चुनाव के दैराव उनके बेटे कार्त्ती ने नोट के बदले वोट का खेल किया। कारपोरेट घराने वेदांता के साथ उनके संबंध बार बार उछले हैं और वेदांता को इसका लाभ खनन के क्षेत्र में कितना मिला है, यह भी खुली किताब है। स्पेक्ट्रम मामले में अनिल अंबानी की पेशी सीबीआई में हो रही है और उनसे भी कैसे रिश्ते चिदंबरम के हैं, यह मुंबई में आप किसी से भी जान सकते हैं। प्रणव मुखर्जी तो देश के वित्त मंत्री रहते हुये अंबानी बंधुओं के झगड़े सुलझाने से लेकर उन्हें देश के विकास से जोड़ने के लिये खुल्लम-खुल्ला यह कहने से नही कतराते कि वह अनिल-मुकेश अंबानी को बचपन से जानते हैं।

अन्ना हजारे जी मैं खुद क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ हूं और इसका जिक्र मैंने 2007 में फिक्की के एक समारोह में किया था। इसके संकेत आपको पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में दिखायी दिया होगा। जी, सवाल संकेत का नहीं है। वक्त कार्रवाई का है। आपको तो जन लोकपाल में ऐसी व्यवस्था करनी है कि लोकपाल के खिलाफ भी शिकायत आये तो उसका निस्ताराण भी एक माह के भीतर हो जाये। यह सिर्फ सरकार के आसरे कैसे संभव है। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को आपने ही टेलीकाम का प्रभार ए राजा के फंसने के बाद दिया। जाहिर है वह काबिल हैं तभी आपने अतिरिक्त प्रभार दिया। लेकिन हुआ क्या, सरकार का दामन बचाने के लिये उन्होने 2 जी स्पेक्ट्रम में कोई घोटाला भी हुआ है, इसे ही खारिज कर दिया और तर्को के सहारे कैग की रिपोर्ट को भी बेबुनियाद करार दिया। फिर कृषिमंत्री शरद पवार जी को आपने भ्रष्टाचार की रोकथाम वाली कमेटी में रखा है। अब आप ही बताईये हम उनसे क्या बात करेंगे। क्या यह कहेंगे कि लोकपाल में इसकी व्यवस्था होनी चाहिये किसी कैबिनेट मंत्री पर अवैध तरीके से जमीन हथियाने का आरोप लगता है तो इस पर फैसला हर हाल में महीने भर के भीतर आ जाना चाहिये। साबित होने पर देश को हुये घाटे की पूर्ति के साथ साथ कडी सजा की व्यवस्था होनी चाहिये।

कोई मंत्री अगर मुनाफाखोरो के हाथ आम आदमी की न्यूनतम जरुरतों को बेच देता है और बिचौलिया या जमाखोर उससे लाभ उठाते हैं और यह आरोप साबित हो जाये तो उस मंत्री के चुनाव लड़ने पर रोक लग जानी चाहिये। हम कौन सी बात पवार जी से कहेंगे, आप ही बताइये क्योंकि आप क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ हैं और कांग्रेस खुले तौर पर कहती है कि शरद पवार कारपोरेट घरानो को साथ लेकर सियासत करते हैं। जिसका लाभ कारपोरेट को बीते पांच बरस में इतना हुआ है जितना आजादी के बाद कभी नहीं हुआ। सरकार और मंत्रियो के साथ खड़े कारपोरेट घरानो के टर्न ओवर में तीन सौ से लेकर तीन हजार फिसदी तक की बढोतरी अगर इस दौर में हुई और हर कारपोरेट ने अपने पैर देश के बाहर फैलाये तो उसके पीछे की अर्थव्यवस्था की जांच कौन करेगा। और लोकपाल बिल में यह सब कैसे आयेगा। फिर काग्रेस ने ही मंहगाई की जड में जब कृषि मंत्री को बताया और इसी दौर में जब कोई कड़ा कानून नहीं बनाया गया तब कैसे कानून मंत्री वीरप्पा मोईली अब लोकपाल को लेकर सक्रिय हो जायेंगे। प्रधानमंत्री जी यह सारे सवाल इस दौर में आपकी ही सरकार के मद्देनजर उठे हैं। इसलिये हमारे सामने सवाल लोकपाल बिधेयक को भी जन लोकपाल विधेयक में बदलने का है। इसीलिये हम जनता की भागीदारी का सवाल उठा रहे हैं।

अन्ना जी आपके कहे हर वाक्य की अहमियत मैं समझता हूं । लेकिन सरकार के कामकाज का अपना तरीका होता है और उस पर बिना सहमति बनाये कोई कार्य आगे बढ़ नहीं सकता। फिर सरकार सिर्फ कांग्रेस की नहीं है आपको समझना यह भी होगा। यह लोकतांत्रिक ढांचा है। मै आपको एक बात याद दिलाना चाहता हूं प्रधानमंत्री जी कि जब देश का संविधान तैयार हो रहा था तो उसका आखिरी ड्राफ्ट लेकर राजेन्द्र प्रसाद महात्मा गांधी के पास गये थे। तब गांधी जी ने एक ही सवाल राजेन्द्र बाबू से पूछा था। इस संविधान में गरीबो और पिछड़ों के लिये क्या है। और राजेन्द्र प्रसाद कोई जवाब दे नहीं पाये थे। मगर उसके बाद ही पिछड़ों को आरक्षण और गरीबो को राहत देने की बात संविधान में जुड़ी। अब लोकपाल और लोकायुक्त संस्था की स्थापना में आधी भागेदारी जनता की नहीं होगी तो फिर देश का मतलब तो वही सत्ता हो गयी जहां से भ्रष्टाचार की लौ फूट रही है। इसलिये मैं जनता के बीच इस मुद्दे को लेकर जाउंगा। अन्ना हजारे जी आप जैसा ठीक समझे आप बुजुर्ग हैं और हमें आपका मार्ग दर्शन चाहिये। मैं भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हूं और चाहता हूं कि आप सरकार को सहयोग दें।

और इस 15 मिनट की बातचीत के बाद अन्ना हजारे खामोश हो गये और वही पीएमओ की ड्योडी से उतरते उतरते उन्होंने मान लिया कि जन लोकपाल का रास्ता मनमोहन सिंह के रास्ते से नहीं निकलेगा बल्कि जनता के बीच से ही रास्ता निकालना होगा। तय किया कि इसलिये जिन्दगी के आखिरी उपवास पर आमरण बैठना ही गांधी का रास्ता अपना कर देश को रास्ते पर लाना होगा। और सत्ता को सीख देगी होगी।-पुण्य प्रसून वाजपेयी

Saturday, 2 April 2011

गम और भी हैं जमाने में क्रिकेट के सिवा


दरणीय प्रधानमंत्रीजी
सादर प्रणाम
इधर के दिनों में झंझावतों में लगातार घिरे रहने के बाद कल मोहाली स्टेडियम में आपको देखा। खुशमिजाजी के साथ घंटों बैठे हुए। पाकिस्तान से जीत हासिल होने के पहले तालियां बजाते हुए। सोनियाजी को भी देखा। बच्चों की तरह खुशी से चहकते-दमकते हुए। राहुलजी को देखा, जीत के जोश से उभरे जज्बे का भाव। कई-कई मंत्रियों को देखा, विपक्षी खेमे के नेताओं को भी। आमिर खान, प्रीटी जिंटा, सुनील शेट्टी जैसे बॉलीवुड कलाकारों को भी। अच्छा लग रहा था। सच कह रहा हूं। पूरा देश एक छत के नीचे। स्टेडियम में 25 हजार की भीड़ के साथ इतनी देर तक देश के आलाअलम लोग शायद ही कभी इतिहास में बैठे हों। कहीं नहीं पढ़ा-सुना। किसे धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आ रहा। क्रिकेट खेल के अविष्कारकों को, जिनकी वजह से यह दिन आया? भारतीय टीम के खिलाड़ियों को, जिन्होंने आप सबको वहां तक बुला लिया? या नये बाजार को, जिसने क्रिकेट को बुलंदियों तक पहुंचाकर देश में राष्ट्रीयता की भावना की व्याख्या नये सिरे से करना शुरू किया है?
मेरी उतनी समझ नहीं इसलिए राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता या क्रिकेट से कूटनीति वगैरह की बातें ज्यादा पल्ले नहीं पड़ती, लेकिन पता नहीं क्यों, टीवी पर आप सबों को देखते हुए बार-बार कुछ चीजें मन को कुरेदती रहीं। इससे आप राष्ट्र के प्रति मेरी निष्ठा या राष्ट्रीयता के प्रति मेरे सम्मान में कोई कमी नहीं समझिएगा। युद्ध की स्थिति और क्रिकेट के खेल, इन दोनों समय में ही राष्ट्र का एकीकरण होता है, राष्ट्रीयता की भावना जगती है, इसे मैं भी जानने-समझने-मानने लगा हूं। वरना, इस देश में कितने देश बन रहे हैं, हर कोई उपराष्ट्रीयता के छलावे के साथ अपनी ब्रांडिंग में लगा हुआ है, इससे मेरे जैसे लोग अवगत हैं। मेरी समझदारी पर तरस जरूर खाइएगा लेकिन राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के संदर्भ में मेरी निष्ठा पर संदेह न कीजिएगा, प्लीज!
इसे सनकमिजाजी या पागलपंथी ही कहिए सर कि टीवी पर क्रिकेट का रोमांच परवान चढ़ रहा था और मेरे आंखों के सामने उस वक्त दो-ढाई साल पहले बिहार का एक दृश्य उभर रहा था। वही 2008 के कोसी के कोप का दृश्य, जब 25 लाख से अधिक की आबादी हाहाकार मचा रही थी। कोसी के तांडव से लोग मर रहे थे, तब केंद्र से आप लोगों को पहुंचने में चार-पांच दिनों का समय लग गया था। यह तय करने में कि यह राष्ट्रीय मामला है या नहीं, 100 घंटे से अधिक का समय लग गया था। याद है न सर! कोसी के इलाके अभी-अभी चार-पांच रातें गुजारकर लौटा हूं, जहां विकास के नाम पर महासेतु बनाकर फिर विनाश की बुनियाद तैयार कर रहे हैं आप दिल्लीवाले। तो शायद कोसी यात्रा का असर है कि क्रिकेट के समय में भी उसी की खुमारी छायी हुई थी। तभी तो आप और सोनियाजी वगैरह-वगैरह जब-जब दिख रहे थे, तब-तब कोसी के कोप वाले ढाई साल पहले के दृश्य सामने आ-जा रहे थे और फिर आपलोग भी याद आ रह थे।
यह बेवकूफी है सर, मुझे पता है लेकिन क्या करूं? राहुलजी को किसी बच्चे की तरह चहकते हुए देखकर अच्छा लगा। उन्हें कितना मिस कर रहा था क्रिकेट के समय, कह नहीं सकता। वे ही तो इकलौते दिल्लीवाले हैं, जो आदिवासियों को सखा-भाई-बंधु वगैरह-वगैरह बताते हैं। गांव में जाकर रात गुजारते हैं। झारखंड में पिछले दिनों हुए राष्ट्रीय खेल का आयोजन भी कल टीवी पर क्रिकेट देखते हुए बार-बार याद आने लगा। लगभग सात हजार खिलाड़ी देश के कोने-कोने से झारखंड में पहुंचे थे। वैसे-वैसे खेलों के खिलाड़ी, जो खेल सरकार के ही रहमोकरम पर जिंदा हैं। क्रिकेट के खिलाड़ियों से कोई कम जोश, जज्बा या उत्साह उनमें नहीं था सर, सच कह रहा हूं, हर दिन खेल में मौजूद था मैं। राष्ट्रीय खेल था सर, 34वां राष्ट्रीय खेल लेकिन आपलोगों में से कोई भी नहीं आया उसमें। न उदघाटन करने, न समापन करने। आप प्रधानमंत्री हैं, आपकी व्यस्तता का अंदाजा सबको है। राष्ट्रपति के आने के पेंच का भी अंदाजा हम जैसे लोगों को है। उपराष्ट्रपति भी नहीं आ सके यहां। और तो और, क्या कहूं सर, आपके खेल मंत्री भी नहीं आये थे यहां। आपके खेल मंत्री वही माकन साहब हैं न सर, जो कल तक इसी झारखंड में कांग्रेस के प्रभारी हुआ करते थे और गाहे-बगाहे यहां पहुंचकर मीडिया वालों के सामने झारखंड-झारखंड की रट किसी बच्चे की तरह लगाते थे। वे क्यों नहीं आये झारखंड के राष्ट्रीय खेल में सर, उनको आपलोगों ने क्यों नहीं भेज दिया जबरिया, इसका जवाब अब तक नहीं मिल पा रहा। आप सब व्यस्त रहे होंगे, खेल मंत्री के लिए तो वह एक बड़ा आयोजन था, वह तो आते, उन्हें तो भेजते आपलोग।
बहुत सवाल पूछते हैं अपने झारखंडी भाई लोग। कहते हैं कि कल संपदा का दोहन करना होगा तो झारखंड राष्ट्र का अभिन्न अंग हो जाएगा, कल माओवादियों का हमला होगा तो राज्य के वर्तमान और भविष्य का दिल्ली से ही खाका तैयार होगा और राज्य बनने के बाद पहली बार एक राष्ट्रीय आयोजन हो रहा था, तो यह राष्ट्र का अभिन्न अंग नहीं था। किसी को समय नहीं मिला। मालूम है सर, यहां के लोग पिछड़े हैं। मीन माइंडेड हैं, इसलिए ऐसी छोटी-छोटी बातों को बतंगड़ बना देते हैं। सच कह रहा हूं सर, मैं आपलोगों के क्रिकेटिया प्रेम का जरा भी विरोधी नहीं वरना यह सवाल ही सबसे पहले पूछता कि क्या किसी देश का पूरा सिस्टम एक खेल के लिए ठप किया जा सकता है! घोषित तौर पर। तब यह भी पूछता कि आखिर अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस जैसे देश क्या अब तक इस खेल से इसी डर से तौबा करते आये हैं कि यह राष्ट्रविध्वंसक खेल है, जो एक बार में पूरे राष्ट्र की गति को आठ-आठ घंटे तक रोक कर रख देता है। अमेरिका, चीनवाले खेल में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं, यह तो आप जानते ही हैं न सर। ओलिंपिक में देखे हैं कि नहीं। मैं यह सब पचड़ा भरा सवाल नहीं कर रहा। एक मामूली नागरिक हूं। सवाल नहीं पूछ सकता। बस जी में आया तो आपसे साझा कर रहा हूं कि क्या वाकई हमारा देश राष्ट्रीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है! बस यूं ही पूछ रहा हूं, अन्यथा न लीजिएगा।( साभार

बिदेसिया)

Saturday, 26 March 2011

मैं रहूंगी तो समाज का पानी भी बचाकर रखूंगी।


मैंआपकी होली। पिछले कुछ वर्षों से मुझसे एक बड़ा वर्ग अलगाव-दुराव का भाव बरतने लगा है। वे कहते हैं कि मैं तो लुच्चे-लफंगों का त्यौहार हूं। मुझे उन्मादी बताते हैं। लेकिन मैं वैसी हूं नहीं। लोक को मस्ती में पिरोनेवाली हूं मैं। पर्व-त्यौहारों, धार्मिक उत्सवों-आयोजनों के बीच अपने तरह की संभवतः अकेली हूं मैं। धार्मिक पर्व-त्यौहार की शक्ल में रहते हुए भी उससे बहुत अलहदा हूं। सीधा वास्ता नहीं है मेरा धार्मिक अनुष्‍ठानों या कर्मकांडों से। मेरे नाम पर पूजा-पाठ कर लो तो ठीक, नहीं करो तो भी कोई बात नहीं। अन्य पर्व-त्यौहारों की तरह किसी खास देवी-देवता की उपासना से भी मेरा ठोस संबंध नहीं। ब्रज वाले कृष्‍ण को केंद्र में रखते हैं, अवध वाले रामचंद्र को। बनारस वालों के लिए दिगंबर यानी शंकर की होली भाती है। गांव-जवार में अपने-अपने कुलदेवता को केंद्र में रखते हैं सब। परलोक से भले वास्ता ज्यादा न हो लेकिन लोक से जितना वास्ता है, उतना शायद अन्य त्यौहारों का नहीं।
अब भी चलो गांव में, देख लो कि मैं कैसे अपने नाम पर जातीय और सांप्रदायिक दूरियों को पाटती हूं। कोई दलित और अगड़ी का भेद नहीं होता। जिसे चाहे रंग लगाओ, राह गुजरते हुए पीछे से धूल-गरदा डालकर भाग जाओ। कोई किसी भी जाति का हो, गांव की सार्वजनिक जगह पर जब गीत-गवनई का दौर शुरू होता है, तो यह नहीं पूछा जाता कि कौन फलां जाति का है, कौन क्या है। सब एक साथ बैठते हैं ढोल, झाल लेकर। एक ही रंग में रंगे हुए। बड़े लोगों के दरवाजे पर भी उसी भदेस अंदाज में बात होती है, जो अंदाज किसी मामूली और छोटे लोगों के दरवाजे पर होता है। मस्ती, मस्ती और मस्तीअल्हड़पन के साथ सामूहिकता को बचाये-बनाये रखने की कोशिश होती है मेरी। मैं सिर्फ हिंदू की नहीं हूं।
फणीश्वरनाथ रेणु को जानते हो न! वे अपने गांव में होली गाने के बाद बगल के मुसलमानों के गांव में झलकूटन का आयोजन करवाते थे। वाजिद अली शाह, नजीर अकबराबादी का नाम सुना है आपने, मेरे पर कई-कई गीत लिख डाले हैं उन्होंने। और भी कई हैं, कितना बताऊं। यह तो आप भी मानते हो न, मैं अकेली हूं, जिसे आप चाहकर भी अकेले नहीं मना सकते। आप दिवाली की तरह नहीं कर सकते कि घर में तरह-तरह के पटाखे लाओ, मिठाइयां लाओ, नये कपड़े पहनो और चकाचौंध लाइट वगैरह जलाकर मना लो। मैं व्यक्तिवाद को तोड़ती हूं। होली मना रहे हो या मनाओगे, इसके लिए समूह में आना ही होगा। दिन-ब-दिन व्यक्तिवादी होते समाज और पर्व-त्यौहारों के बदलते स्वरूप के बीच मेरी पहचान ही सामूहिकता से है।
सब यह भी कहते हैं कि मैं तो दारू-सारू वालों की हूं। यह तो वैसी ही बातें करते हैं जैसे पूरा समाज एक मेरे लिए ही सालों भर इंतजार करता रहता है कि मैं आउं तो दारु-सारू पिएगा। बाकी सालों भर हाथ ही नहीं लगाता। सड़कों पर शादी-बारात का जो जुलूस दिखता है, उसमें कोई कम पीकर हंगामा करते हैं। वही क्यों, सरस्वती पूजा, दुर्गा पूजा के भसान में तो दारू उत्सव ही मनाते हैं सब। कोई नेता जीत जाए तो दारू की नदी बहती है, किसी को जीतना हो तो दारू का ड्रम लाकर रखता है। फिर मेरे से ही दारू वगैरह का नाम क्यों जोड़ते हैं सब। खैर! मैं इससे बहुत परेशान नहीं हूं। मैं आज खुद को बचाने की गुहार लगा रही हूं तो उसकी वजह कुछ दूसरी है, जिससे मेरे अस्तित्व पर संकट मंडराता दिख रहा है।
अब उन्मादी के बाद मुझमें संकट के तत्वों की तलाश की जा रही है। रोज-ब-रोज तरह-तरह के विज्ञापन आ रहे हैं। अभियान चल रहा है। अनुरोध किया जा रहा है। निजी और सरकारी स्तर पर भी। प्रकारांतर से सबकी एक ही गुहार है, एक ही सलाहियत है कि सुखी होली खेलें, तिलक होली खेलें, अबीर की होली खेलें, पानी को बचा लें। पानी को बचाने के लिए मुझे बीच में लाया गया है। सामूहिक रूप से कोशिश हो रही है, जैसे जल संकट का कारण मैं ही हूं। आंकड़े बताये जा रहे हैं कि मैं कितना पानी बर्बाद करवा देती हूं। साल में एक दिन आती हूं मैं, तो इस कदर मेरे नाम से भय का भाव भरा जा रहा है। पानी का वास्ता देकर। कोई यह नहीं पूछता कि एक-एक आदमी ने अपने समाज में कई-कई गाड़ियां क्यों रखी हैं। इटली समेत कई देशों में तो एक घर में एक गाड़ी से ज्यादा रखी ही नहीं जाती। एक-एक आदमी ने यहां चार-चार गाड़ियां रखी हैं। उन्हें धोने में जो पानी जाता है, उससे पानी की बर्बादी नहीं होती क्या?
मेरी पहचान को खत्म करने का अभियान चल रहा है। जैसे मैंने ही सारे जलस्रोतों को सूखा दिया है। नदियों का अस्तित्व मैंने ही खत्म कर दिया है। तालाबों और जलाशयों के नामोनिशां जैसे मैंने ही मिटा दिये हैं। मैं लोक पर्व हूं, सामूहिकता में जीती हूं। मैं पानी बचाने का विरोध नहीं कर रही। पानी बचेगा तभी मैं बचूंगी लेकिन मेरे मूल पहचान को भी बचे रहने दो। अब तो रंग-पानी ही मेरी पहचान है न! पहले तो लोग अलकतरा, अलमुनियम पेंट वगैरह भी लगा देते थे लेकिन अब सब अपने-अपने समाज ने बदल लिया है। समाज चाहता है कि उसका आयोजन बदलते समय के साथ सुंदर रूप में रहे। सर्वाइव करने लायक रहे। अब रंग-पानी पर भी आफत नहीं लाओ। अखबारवाले अभियान नहीं चलाओ न! लोगों का मानस नहीं बदलो न! मुख्यमंत्री-राज्यपाल वगैरह भी अपील कर रहे हैं कि सूखी होली खेलें, तिलक-अबीर होली खेलें। वे यह क्यों नहीं कहते कि एक गाड़ी रखो, गाड़ी रोज नहीं धोया करो, वह पानी की ज्यादा बर्बादी करवाता है। मैं ही सबके निशाने पर क्यों हूं। बाजार वाले चाहकर भी मेरे नाम पर दीपावाली या दशहरे की तरह बाजार खड़ा नहीं कर पा रहे इसलिए क्या! नहीं मालूम। लेकिन एक सच्ची बात कहूं। मैं रहूंगी तो समाज का पानी भी बचाकर रखूंगी। मुझे बचा लो प्लीज। (मोहल्लालाइव से साभार)

शुभस्ते पंथान:


उसने कहा विनम्र बनो
मैं डरपोक हो गया.
उसने कहा संतोष बड़ा धन है
मैं आलसी और गरीब हो गया.
उसने कहा निडर रहो
मैं असभ्य हो गया.
जब निर्भय होने को कहा
मैं आक्रामक हो गया.
उसने सदा अस्मिता की बात की
मैं अहंकारी हो गया.
उसने कहा चुप रहना अच्छी बात है
मैं गूंगा हो गया.
जब खुल कर बोलने को कहा
मैं अमर्यादित हो गया.
उसने कहा स्पष्टवादी बनो
मैं दिल दुखाने लगा.
उसने समझदार बनाने की सलाह दी
मैं चतुर और चालाक बन गया.
उसने कहा द्रढ़ रहो
मैं जिद्दी हो गया.
उसने कहा काम आराम से करना चाहिए
मैं पूरा सो गया.
उसने कहा विफलता इतनी बुरी नहीं होती
मैंने प्रयास छोड़ दिए, विफलता की आदत डाल ली.
उसने कहा सांप मत बनना
मैं केंचुआ बन गया.
उसने अहिंसा को बड़ा गुण बताया
मैं पत्ता-गोभी बन गया.
उसने कहा भगवान् है
मैं निट्ठल्ला हो गया.
उसने कहा सब कुछ भगवान् थोड़े ही देखता है
मैं चोर बन गया.
वह कुछ कहता रहा
मैं कुछ बनता गया
मैं समझाने लगा
वह माना नहीं.
फिर मुझे भी गुस्सा आ गया
मुझे आदमी ही रहने दो
देवता क्यों बनाते हो
ये दुनियां किताबी बातों से नहीं चलती.
वह रुका और कहा-मैं तो खुद आदमी बनने की राह का पथिक हूँ
आपको देवता क्या बनाऊंगा?
आपने कुछ पूछा जरूर होगा
लेकिन कहा मैंने खुद से है
आपने सुन लिया होगा,
पर अमल तो मुझे करना है
आप जैसे भी हो, प्यारे हो
अपने हिसाब से इंसानियत की राह पर हो.
लेकिन यहाँ से मेरी राह जुदा होती हैं
चाहो तो साथ चलो, क्योंकि मंजिल तो एक ही है
अलग चले तो फिर मिलेंगे
साथ रहे तो साथ हैं ही.
विदा दोस्त! आपके साथ सफ़र बहुत अच्छा रहा
शुभस्ते पंथान:
और वह गुनगुनाता हुआ मुड़ गया.
मुझे जीत की इतनी खुशी नहीं हुई
जितना उसके बिछुड़ने का गम.
सोचा भी चल पडूँ उसी के साथ
या फिर पुकार लूं अपनी ही राह पर.
सोचता खड़ा रहा फिर चल पड़ा अपनी ही डगर.
कानों में अब भी उसकी गुनगुनाहट गूंजती है
जो कोई भजन नहीं था
एक फ़िल्मी गाना था
(ज्योति कलश छलके !!...शायद!)
कभी कभी उसकी याद बड़ी शिद्दत से आती है
उसकी बातें आँखों के सामने मुस्कुरातीं हैं
कभी कभी वह हमराह चलता दिखाई भी देता हैं
पर वो भरम है.
में अपनी बात पे कायम हूँ
उसकी पता नहीं क्या जिद है?
मेरी बला से! साभार हिन्द -युग्म 

 

Sunday, 6 March 2011

रेल का राजनीतिक सफर

-के  बाबला

हवाई चप्पल,सूत साड़ी पहनकर संसद भवन पहुँचने वाली ममता बनर्जी को पता है कि उनकी राजनीतिक यूएसपी आम आदमी है। अब इसी आम आदमी के माध्यम से ममता दीदी तृणमूल काँग्रेस का झण्डा राज्य सचिवालय (राइटर बिल्डिंग) में लहराता देखना चाहती हैं, और खुद को पश्चिम बंगाल की मुखमंत्री की गद्दी पर कबीज़। इस चक्कर में अगर रेल बजट 2011-12 में बंगाल के लिए कुछ ज्यादा निकल भी जाता है तो हमें बुरा नहीं लगना चाहिए। क्योंकि कल की राजनीति में आज ही निवेश करना ममता ने आपने राजनीतिक गुरु प्रणब दा से सीखा है। ममता बंगाल की नई पहचान बनना चाहती हैं, और रेल बजट से बंगाल में परियोजनाओं की बरसात कर विधानसभा चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहती हैं। 294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में 45 योजनाएँ लागू कर दीदी प्रत्यक्ष रूप से 90 विधानसभा सीटों में अपनी पकड़ मजबूत कर रही हैं। सिंगूर और नंदीग्राम में किसान, आदिवासी की जमीन पर रेल कारख़ाना, ओध्योगिक पार्क खोल साथ ही लोगों को नौकरी बाँट रेल के जरिए विकास का सपना दिखाया जा रहा है। इन सब के बीच दीदी का हमेशा से खास रहा कोलकाता में तृणमूल काँग्रेस ने पिछले साल नगर निकाय चुनावों में भारी जीत हासिल की है। इसी जीत को विधानसभा चुनावों में बरकरार रखने के लिए कई परियोजनाओं की झड़ी लगा दी गई है। कोलकाता की जीवन रेखा मानी जाने वाली मेट्रो के लिए ममता के पास 34 योजनाएँ हैं। 50 लोकल, 16 उप नागरी ट्रेन, 50 सब अर्बन गाडियाँ, मदर टेरसा, रवीन्द्रनाथविवेकानंद के नाम ट्रेन जैसी योजनाओ के जरिए ममता हर आम और खास तक पहुँच वामदलों के किले में सेंध की कोशिश में है, जहां 32 सालों से उनका आधिपत्य है। रेल बजट को चुनावी मेनिफेस्टो के रूप में प्रस्तुत कर ममता ने कोलकाता वासियों को खुश तो कर दिया लेकिन ममता की गाड़ी यहीं नहीं रुक रही। पश्चिम बंगाल से पहचान बनाने वाली ममता की तैयारी नॉर्थ ईस्ट से होते हुये पूरे भारत को हरे रंग में रंगने की है। मणिपुर, अरुणाचल, असम, मेघालया, त्रिपुरा, सिक्क्म, नागालैंड के राजधानी में तृणमूल काँग्रेस का दफ्तर खोल दीदी नॉर्थ ईस्ट में अपनी उपस्थिति पहले ही दर्ज करा चुकी है। बजट में मणिपुर को रेल कारख़ाना तथा नॉर्थ ईस्ट के कई राज्य तक रेल पहुंचा ममता रेल के साथ नॉर्थ ईस्ट में अपना राजनीतिक सफर को आगे बढ़ाने के प्रयास में है। बहरहाल ममता इस समय अपना पूरा ध्यान 16 अप्रैल से होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में दे रही हैं। क्योंकि दिल्ली का रास्ता भी यहीं से साफ होता है।
    
ममता समझती हैं देश में महंगाई है इसलिए किराया न बढ़ाते हुये यात्रियों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम किया है। 56 नई एक्सप्रेस, 9 दुरान्तो, 3 सताब्दी, 22 डी.एम.यू, 13 पैसेंजर के अलावा 33 ट्रेनों का विस्तार और यात्रियों के लिए मल्टीपर्पस स्मार्ट कार्ड की शुरुआत कर यात्रा सुविधाजनक बनाने के कोशिश जारी है । परंतु वर्तमान जर्जर एवं कमजोर पटरियों के भरोसे 103 नई ट्रेन को हरी झंडी दिखाई जाएगी। जिन पटरियों को 8 साल में बदल दिया जाना था उनपर 12 साल तक ट्रेनें दौड़ना क्या दुर्घटनाओं को खुला निमंत्रण नहीं है? ममता सामाजिक दायित्व निभाते हुये रेलवे स्टेशनों के किनारे झोपडी में रहने वालों को गृह सुखी योजना के तहत 10 हजार पक्के आशियाने उपलब्ध कराने का वादा कर अपने आप को गरीबों का सबसे बढ़ा हितैषी साबित करने की कोशिश में है। सीमा पर लड़नेवाले 16 हजार पूर्व सैनिकों को नौकरियाँ दे देश को रेल के मानवीय चेहरा से रु ब रु करने के प्रयास में है। देखना होगा कि पिछले 174 परियोजनाओं की तरह ये योजनाएँ भी सिर्फ हवाई दावे बनकर न रह जाए, बल्कि योजनाओं को अमली जामा पहनाना भी उन्ही के जिम्मे है। लालगढ़ ,सिंगूर, नंदीग्राम जैसे जनांदोलनों से किसान और आदिवासी नेता की छवि बना चुकी ममता अपनी राजनीतिक दायरे को राष्ट्रीय परिदृश्य में ले जाने की जुगत में है। इस क्रम में रेड कॉरीडोर (बस्तर, झारग्राम, गढ़चिरोली, जंगल महल, झारखंड) के नक्सल प्रभावित इलाकों तक रेल गाड़ियों का परिचालन कर किसानों, आदिवासियों को रेल के जरिए विकास का सफर कराने की कोशिश में है। लेकिन आशंका यह है कि आम आदमी के आड़ में रेल परियोजनाओं के जरिये इलाके की खनिज पदार्थों तक उद्योगपतियों की पहुँच आसान करने की कोशिश तो नहीं है? राजनीति के इस सफर में दीदी वामदलों को हर हाल है में चुनौती देने की तैयारी में है। दीदी किसी भी हाल में वाम दलों को सत्ता से बाहर देखना चाहती हैं।



इन सब से इतर रेल से रोज 1.5 करोड़ सफर करने वाले यात्री सिर्फ समय के दृष्टि से किफ़ायती और दुर्घटना रहित यात्रा करना चाहते है। मंत्री महोदया का कहना है, रेल दुर्घटनाओं में 15 प्रतिशत की कमी आई है। लेकिन पिछले साल 90 रेल दुर्घटनाओं में तीन सौ से ज़्यादा लोगों ने अपनी जान गवाई है। दुर्घटनाओं को कम करने के लिए मंत्री महोदया बजट में एंटि कोल्लिजन डिवाइस(ए.सी.डी), मानव रहित क्रोससिंग को खत्म, सिंगनल दुरस्त करने की बात कर रही हैं। 1991 में शुरू हुई ए.सी.डी तकनीक को हर रेल मंत्री अपने कार्यकाल में चालू करने का भरोसा देता है। साथ ही 45 करोड़ के लागत से तैयार एक ए.सी.डी को 9000 इंजनों में लगाना कितना प्रासंगिक है यह मंत्री महोदया खुद समझती हैं, वह भी जब ए.सी.डी की 100 प्रतिशत सफलता की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है। आज टेक्नालजी इससे कहीं आगे निकल चुकी है। सुविधाओं की खबर ले तो गंदे प्लाटफार्म, भोजन की स्तर हीनता, गाड़ियों के डिब्बो में खचा-खच भीड़, समय सारणी का पालन ना होना, भारतीय रेल में आम बात हैं जिसकी कोई चर्चा आम आदमी के रेल बजट में नहीं की गई है। इन सब के बावजूद ममता दीदी इसे आम आदमी का बजट बता रही है। जानकारों की माने तो रेल से राजनीति साधी जाती है। ममता ने राजनीतिक लाभ के लिए रेल बजट को डीरेल किया। वहीं विपक्ष इसे बंगाल का रेल बजट बता रहा है। जो भी हो आम आदमी को मतलब इससे नहीं है कि ममता इस रेल बजट से अपनी राजनीतिक कैरियर में कितनी लंबी छलांग लगाती है उसे मतलब है तो सिर्फ इससे कि जब वह सफर करे तो ममता कि योजनाएँ बाथरूम के बाहर लेटी हुई न मिले।       
10 मार्च  2011 D.N.A LUCKNOW संस्करण में प्रकाशित