Saturday, 30 July 2011

आपकी टाई उनका फंदा

  
देश के अव्वल राज्यों की सूची में आने वाला महाराष्ट्र आज किसान आत्महत्या के कलंक से कलंकित हो गया है।11जिलों वाले पूर्वी महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र तीन सौ सालों से राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक जनांदोलनों का केंद्र रहा है। कभी विदर्भ के किसान होने के साथ जो सम्मान और गरिमा जुड़ी हुई थी वह आज आशाहीनता और हताशा में बादल गई है। कपास,सोयाबीन और संतरा के लिए पहचाना जाने वाला विदर्भ के नाम के साथ आज स्वत: ही किसान आत्महत्याओं की तस्वीर दिमाग में कौंधने लगती है। विदर्भ में कपास को सफ़ेद सोना कहा जाता है पर विदर्भ की खेती और विदर्भ के किसान, आज औद्योगिक सभ्यता के प्रमुख निशाने पर हैं। जून 2005से अब तक विदर्भ क्षेत्र में मौत को गले लगाने वाले किसानों की कुल संख्या 7860 हो चुकी है। सूखाजल संकट,चाराभोजन और बेरोजगारी का संकट विदर्भ में 15,460 गांवों तक पहुंच चुकी है। जून 2006 में केंद्र सरकार की ओर से घोषित किसानों के लिए राहत पैकेज भी किसानों के लिए लाभकारी नहीं रहे। महाराष्ट्र सरकार ने जिन गांवों को सूखाग्रस्त घोषित किया है,उनके लिए चलाए जा रहे राहत कार्य कागजों तक ही सीमित हैं। सूखा पडऩे से मवेशियों के लिए चारे का संकट गंभीर हो गया है। लोग अपने पशु कसाइयों के हाथों में बेच रहे हैं। चारा संकट के कारण मवेशी भी असमय काल के गाल में समा रहे हैं। विदर्भ के मामले में प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्तक्षे कर किसानों को सिंचाई का पर्याप्त पानीमुफ्त स्वास्थ्य सेवाखाद्य सुरक्षाग्रामीण रोजगार आदि की उपलब्धतासुनिश्चित कराई जिससे किसान आत्महत्या रूक सके। बावजुद  समस्या जस की तस बनी हुई है। यहाँ की 60% खेती आज भी मौसम की मेहरबानी पर निर्भर है, हालांकि सरकार ( सिंचाई विभाग) हर खेत तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध करने की बात तो करता है पर ये दावे कागजों तक ही सीमित रह जाते है।विदर्भ में आज भी 90 प्रतिशत खेती असिंचित है। असिंचित खेती को कोई प्रत्यक्ष सबसिडी नहीं है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में फसल मारी जाएगी और नकदी फसलों की खेती करने वाले किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। राज्य की दूसरी गंभीर समस्या है बिजली की कटौती। विदर्भ में स्थापित विद्युत ईकाइयों से उत्पादित बिजली से दूसरे राज्यों के शहर रौशन होते हैं। जबकि विदर्भ का किसान को सिंचाई के लिए भी बिजली नहीं मिल पाती है. विदर्भ मे अब बिजली और सिंचाई की समस्या एक दूसरे में गुंथ चुके हैं। किसान बीज, उर्वरककीटनाशक के लिए कर्ज़ लेता है। फसल अच्छी नहीं होने के कारण साहूकारों को कर्ज़ नहीं चुका पता है और आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठता है।  बैंकों द्वारा ऋण बांटे जाने की प्रकीर्य इतनी जटिल है कि आज भी 60% से ज़्यादा किसान साहूकार की चंगुल से बच नहीं पाते है। कर्ज़ माफी की बात कर ले तो सरकार ने हाल ही में 1075 करोड़ का कर माफ़ी कर पूरे देश में अपने को किसानों का हितैषी बता रही है जब कि असलीयत कुछ और ही बयां करती है। सरकार ने 1075 करोड़ का कर्ज़ तो जरूर माफ कर दिया है. साथ ही साथ किसानों को 17000 करोड़ का बोनस देना बंद कर दिया यानि पैकेज दे कर पॉलिसी को बंद कर दिया गया। आमूमन विदर्भ में किसान के पास कम से कम 4 से 5 एकड़ ज़मीन है। इतनी ज़मीन होने के बावजूद भी उन पर प्रति व्यक्ति 50 से 60 हजार का कर्ज रहता है। पश्चिमी महाराष्ट्र में किसानों के पास खेत कम हैं पर उन पे प्रति व्यक्ति कर्ज 2 से 5 लाख तक होता है। सरकार की पूरी कर्ज़ माफी की प्रकीर्य बंकों से लिए गए ऋण के अनुसार होती है। इन सब का ज़्यादा लाभ पश्चिमी महाराष्ट्र के लोगों को लाभ पहुंचाने के उदेश्य से किया जाता रहा है. इन नीतियों के जरिये विदर्भ के किसानों के साथ सोतेला व्यवहार किया जाता रहा है। हर बार नीतियाँ ऐसी बनाए जाते हैं कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र को फायदा मिले। नतीजतन किसान आत्महत्या की राह अपनाते हैं, खासकर उस स्थिति में जब प्रधानमंत्री द्वारा घोषित विशेष राहत पैकेज और सरकारी कर्जमाफी की योजना विदर्भ के किसानों को संकट से उबारने में असफल सिद्ध हो रही है। इन सब के साथ किसान के परिवारों को मुफ्त में बीमारियाँ, कुपोषण का सामना करना पड़ता है। संतरा, रबी, कपास, बाजरा, आदि फसलों के लिए मशहूर विदर्भ आज सरकारी उदासिनता, बाज़ार की नीतियों,मौसम की मार और साहूकार या बैंकों के दबाबों के कारण किसान आत्महत्या की राजधानी बन गया है। जबकिमहाराष्ट्र की फलती-फूलती राजधानी और देश की वित्तीय राजधानी मुंबई को देखें जो विदर्भ से मात्र 700 कि.मी. की दूरी है पर दोनों के हालातों में ज़मीन आसमान का फर्क है।    
मीडिया के कुछ एक सस्थान को छोड़ हाल के वर्षों में मीडिया की जो भाषा और बंगीमा बनी है उसमें जन साधारण की अभिव्यक्ति को साधारण ही माना जाता है। आज खेती किसानी करने वाले लोग मीडिया की नज़र मेंनत्था’ से बड़ी कीमत नहीं रखते। उनके मरने की खबर उनके लिए बस एक सेलेबल न्यूज़ आइटम है जो जिसे अगले दिन राखी सावंत के ठुमके पर लुटाया जा सकता है।
हम जो कुछ पढ़ते-देखते-सुनते हैं वह सिर्फ एक आभासी चेहरा है असल राजनीति और उसका अर्थशास्त्र तो समाज के कुछ खास वर्गों के हाथों में जो तय करते हैं की 
रस्सी कब गले की टाई होगी और कब फांसी का फंदा

-30-7-11 D.N.A LUCKNOW में प्रकाशित-

Friday, 29 July 2011

बीजेपी के गले का फास येदियुरप्पा सरकार

10 महीने पहले बीजेपी अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने ही येदियुरप्पा की कुर्सी बचायी थी तो क्या दस महीने बाद गडकरी येदियुरप्पा की कुर्सी लेने पर राजी हो चुके हैं। यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि अक्टूबर 2010 में भी लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगडे ने अवैध खनन को लेकर सीधे येदियुरप्पा पर ही निशाना साधा था और तब आरएसएस येदियुरप्पा के साथ खड़ी हो गई थी। और गड़करी ने खुले तौर पर येदियुरप्पा को क्लीनचीट दी थी। तो फिर दस महीने में ऐसा क्या हो गया जो बीजेपी के भीतर से ही येदियुरप्पा को हटाने की आवाज आने लगी। असल में येदियुरप्पा बीजेपी शासित राज्यो में सिर्फ भ्रष्टाचार के प्रतीक भर नहीं है बल्कि बीजेपी के भीतर चल रही सियासी बिसात के सबसे अहम प्यादे बन चुके हैं।
गडकरी इस प्यादे को बीजेपी की दिल्ली चौकडी तले कटने नहीं देना चाहते हैं तो दिल्ली की चौकडी ना सिर्फ येदियुरप्पा को भ्रष्टाचार पर बनते राष्ट्रीय मुद्दे तले प्यादा बनाकर काटना चाहती है बल्कि भ्रष्टाचार में फंसी मनमोहन सरकार के खिलाफ येदियुरप्पा सबसे गाढ़ा दाग मनवाने के लिये बेताब है। असल में बीजेपी की इस दिल्ली लड़ाई के पिछे सवाल सिर्फ येदियुरप्पा का नहीं है। बल्कि भ्रष्टाचार की बिसात पर अपनी पैठ बनाने की सत्ता की अनूठी लड़ाई है। कर्नाटक में इस वक्त डेढ दर्जन से ज्यादा पावर प्लांट पाइप लाइन में है। जिसमें नौ निजी कंपनियां ऐसी है जो सीधे बीजेपी की अंदरुनी सियासी संघर्ष में फिलहाल सत्ता के करीबी हैं। कर्नाटक का जो सच लोकायुक्त ने अपनी रिपोर्ट में दिखाया है, वह चार बरस में 16 हजार 85 करोड के राजस्व का चूना लगने का है। लेकिन पावर सेक्टर का खेल बताता है कि निजी कंपनियो के जरीये पावर प्लांट लगाने के लाइसेंस के पीछे 50 हजार करोड़ से ज्यादा के वारे न्यारे हैं। इसीलिये कर्नाटक पावर कारपोरेशन को सिर्फ दो पावर प्लाट से जोड़ा गया है बाकि की फेरहिस्त में रिलायंस, इंडो-भारत पावर, मुकुंद लिमेटेड,सुराना पावर, एटलस पावर , कोस्टल कर्नाटक पावर, और पावर कंपनी आफ कर्नाटक का नाम है जिसके पीछे इस वक्त बीजेपी के वही कद्दावर है जो नहीं चाहते कि येदियुरप्पा कुर्सी छोड़ें।
इसी तरह हाउसिंग और राजस्व मंत्रालय में भी तीस हजार करोड़ से ज्यादा का खेल जमीन पर कब्जे को लेकर चल रहा है और संयोग से दोनो की मंत्रालय के मंत्रियों के नाम घोटाले में आये हैं। इसलिये बैगलूर में सत्ता का जो संघर्ष योजनाओं के खेल से उभारता है वह दिल्ली पहुंचते पहुंचते भ्रष्टाचार की सियासी चाल से जुड़ जरुर रहा है । मगर उसका रंग अब भी घंघे से कमाई का ही है। गडकरी बतौर बीजेपी अध्यक्ष पार्टी के भीतर सीधे संघर्ष के मूड में हैं। क्योंकि उन्हे लगने लगा है कि अगर येदियुरप्पा पर फैसला आडवाणी के घर से निकलेगा तो उनकी हैसियत घटेगी। इसलिये फैसले की नब्ज गडकरी अपने हाथ में रखना चाहते हैं, चाहे आडवाणी के घर बैठक से जो भी निकले। इसीलिये येदियुरप्पा भी जिस फार्मूले के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, उसमें चेतावनी दिल्ली की चौकडी के लिये ही है, जो अनंत कुमार कर्नाटक की कुर्सी पर भैठाने के लिये बैचेन है, जिससे करोड़ों के वारे-न्यारे का पाला झटके में बदल जाये।
उधर येदियुरप्पा का फार्मूला सीधा है। लोकायुक्त की रिपोर्ट में उनका नाम बतौर मुख्यमंत्री है। जबकि भ्रष्टाचार के घेरे में जो चार मंत्री फंसे है उनमें से दो मंत्री अंनत के करीबी हैं। राज्य के राजस्व, स्वास्थ्य , हाउसिंग और पर्यटन मंत्री का नाम लोकायुक्त की रिपोर्ट में है। येदियुरप्पा का कहना है पहले तो चारो मंत्रियो को हटाना होगा। फिर लोकायुक्त की रिपोर्ट में चूंकि काग्रेस के राज्यसभा सांसद लाड और कुमारस्वामी का भी नाम है तो भ्रष्टाचार के फंदे में उन्हे फांसने के लिये कोई व्यूहरचना करना जरुरी है। और इसके लिये बीजेपी सांसद सदानंद गौडा की अगुवाई में पहल तुरंत शुरु करनी चाहिये। यहां यह जानना भी जरुरी है कि सदानंद का मतलब कर्नाटक की सियासत में येदियुरप्पा की छांव का होना है। तो येदियुरप्पा का अपना चक्रव्यूह अपनों के जरीये बीजेपी की दिल्ली चौकडी के ही पर कतर अपने विकल्प का भी ऐसा रास्ता बनाने की दिशा में है, जहा गद्दी जाने पर भी सत्ता की डोर येदियुरप्पा के ही हाथ में रहे। और इस पूरे खेल की सियासी बिसात नीतिन गडकरी अपनी हथेली पर खेलना चाहते है जिससे आडवाणी के घर बैठक करने वालो का यह एहसास हो कि रांची में अर्जुन मुंडा से लेकर बैगलूरु में येदियुरप्पा तक को कुर्सी पर बैठाने या हटाने के पीछे वही रहेंगे। क्योंकि अब बीजेपी में अंदरुनी सत्ता का संघर्ष है कही ज्याद तीखा हो चला है क्योंकि भ्रष्टाचार में घिरती सरकार के सामने खडी बीजेपी किसके कहने पर किस रास्ते चले जो असल नेता कहलाये संकट यही है। इसलिये येदियुरप्पा की चलेगी तो दिल्ली की बीजेपी चौकडी की पोटली हमेशा खाली ही रहेगी और बीजेपी अद्यक्ष नीतिन गडकरी की पोटली पर आंच आयेगी नहीं ।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

Tuesday, 26 July 2011

आपकी टाई उनका फंदा ....

देश के अव्वल राज्यों की सूची में आने वाला महाराष्ट्र आज किसान आत्महत्या के कलंक से कलंकित हो गया है। 11 जिलों वाले पूर्वी महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र तीन सौ सालों से राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जनांदोलनों का केंद्र रहा है। कभी विदर्भ के किसान होने के साथ जो सम्मान और गरिमा जुड़ी हुई थी वह आज आशाहीनता और हताशा में बादल गई है। कपास, सोयाबीन और संतरा के लिए पहचाना जाने वाला विदर्भ के नाम के साथ आज स्वत: ही किसान आत्महत्याओं की तस्वीर दिमाग में कौंधने लगती है। विदर्भ में कपास को सफ़ेद सोना कहा जाता है पर विदर्भ की खेती और विदर्भ के किसान, आज औद्योगिक सभ्यता के प्रमुख निशाने पर हैं। जून 2005 से अब तक विदर्भ क्षेत्र में मौत को गले लगाने वाले किसानों की कुल संख्या 7860 हो चुकी है। सूखा, जल संकट, चारा, भोजन और बेरोजगारी का संकट विदर्भ में 15,460 गांवों तक पहुंच चुकी है। जून 2006 में केंद्र सरकार की ओर से घोषित किसानों के लिए राहत पैकेज भी किसानों के लिए लाभकारी नहीं रहे। महाराष्ट्र सरकार ने जिन गांवों को सूखाग्रस्त घोषित किया है, उनके लिए चलाए जा रहे राहत कार्य कागजों तक ही सीमित हैं। सूखा पडऩे से मवेशियों के लिए चारे का संकट गंभीर हो गया है। लोग अपने पशु कसाइयों के हाथों में बेच रहे हैं। चारा संकट के कारण मवेशी भी असमय काल के गाल में समा रहे हैं। विदर्भ के मामले में प्रधानमंत्री ने स्वयं हस्तक्षे कर किसानों को सिंचाई का पर्याप्त पानी, मुफ्त स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार आदि की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जिससे किसान आत्महत्या रूक सके। बावजुद  समस्या जस की तस बनी हुई है। यहाँ की 60% खेती आज भी मौसम की मेहरबानी पर निर्भर है, हालांकि सरकार ( सिंचाई विभाग) हर खेत तक सिंचाई सुविधा उपलब्ध करने की बात तो करता है पर ये दावे कागजों तक ही सीमित रह जाते है। विदर्भ में आज भी 90 प्रतिशत खेती असिंचित है। असिंचित खेती को कोई प्रत्यक्ष सबसिडी नहीं है। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में फसल मारी जाएगी और नकदी फसलों की खेती करने वाले किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। राज्य की दूसरी गंभीर समस्या है बिजली की कटौती। विदर्भ में स्थापित विद्युत ईकाइयों से उत्पादित बिजली से दूसरे राज्यों के शहर रौशन होते हैं। जबकि विदर्भ का किसान को सिंचाई के लिए भी बिजली नहीं मिल पाती है. अब बिजली और सिंचाई की समस्या एक दूसरे में गुंथ चुके हैं। किसान बीज, उर्वरक, कीटनाशक के लिए कर्ज़ लेता है। फसल अच्छी नहीं होने के कारण साहूकारों को कर्ज़ नहीं चुका पता है और आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठता है।  बैंकों द्वारा ऋण बांटे जाने की प्रकीर्य इतनी जटिल है कि आज भी 60% से ज़्यादा किसान साहूकार की चंगुल से बच नहीं पाते है। कर्ज़ माफी की बात कर ले तो सरकार ने हाल ही में 1075 करोड़ का कर माफ़ी कर पूरे देश में अपने को किसानों का हितैषी बता रही है जब कि असलीयत कुछ और ही बयां करती है। सरकार ने 1075 करोड़ का कर्ज़ तो जरूर माफ कर दिया है. साथ ही साथ किसानों को 17000 करोड़ का बोनस देना बंद कर दिया यानि पैकेज दे कर पॉलिसी को बंद कर दिया गया। आमूमन विदर्भ में किसान के पास कम से कम 4 से 5 एकड़ ज़मीन है। इतनी ज़मीन होने के बावजूद भी उन पर प्रति व्यक्ति 50 से 60 हजार का कर्ज रहता है। पश्चिमी महाराष्ट्र में किसानों के पास खेत कम हैं पर उन पे प्रति व्यक्ति कर्ज 2 से 5 लाख तक होता है। सरकार की पूरी कर्ज़ माफी की प्रकीर्य बंकों से लिए गए ऋण के अनुसार होती है। इन सब का ज़्यादा लाभ पश्चिमी महाराष्ट्र के लोगों को लाभ पहुंचाने के उदेश्य से किया जाता रहा है. इन नीतियों के जरिये विदर्भ के किसानों के साथ सोतेला व्यवहार किया जाता रहा है। हर बार नीतियाँ ऐसी बनाए जाते हैं कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र को फायदा मिले। नतीजतन किसान आत्महत्या की राह अपनाते हैं, खासकर उस स्थिति में जब प्रधानमंत्री द्वारा घोषित विशेष राहत पैकेज और सरकारी कर्जमाफी की योजना विदर्भ के किसानों को संकट से उबारने में असफल सिद्ध हो रही है। इन सब के साथ किसान के परिवारों को मुफ्त में बीमारियाँ, कुपोषण का सामना करना पड़ता है। संतरा, रबी, कपास, बाजरा, आदि फसलों के लिए मशहूर विदर्भ आज सरकारी उदासिनता, बाज़ार की नीतियों, मौसम की मार और साहूकार या बैंकों के दबाबों के कारण किसान आत्महत्या की राजधानी बन गया है। जबकि महाराष्ट्र की फलती-फूलती राजधानी और देश की वित्तीय राजधानी मुंबई को देखें जो विदर्भ से मात्र 700  कि.मी. की दूरी है पर दोनों के हालातों में ज़मीन आसमान का फर्क है। मीडिया के कुछ एक सस्थान को छोड़ हाल के वर्षों में मीडिया की जो भाषा और बंगीमा बनी है उसमें जन साधारण की अभिव्यक्ति को साधारण ही माना जाता है। आज खेती किसानी करने वाले लोग मीडिया की नज़र में नत्था से बड़ी कीमत नहीं रखते। उनके मरने की खबर उनके लिए बस एक सेलेबल न्यूज़ आइटम है जो जिसे अगले दिन राखी सावंत के ठुमके पर लुटाया जा सकता है।
हम जो कुछ पढ़ते-देखते-सुनते हैं वह सिर्फ एक आभासी चेहरा है असल राजनीति और उसका अर्थशास्त्र तो समाज के कुछ खास वर्गों के हाथों में जो तय करते हैं की रस्सी कब गले की टाई होगी और कब फांसी का फंदा।

Sunday, 10 July 2011

कोटड़ा, एन जी ओ, झारखंड वगैरह

रामशरण जोशी
उदयपुर से करीब 130 कि.मी. के फासले पर कोटड़ा आदिवासी बाहुल्य तहसील है। इसे आदिवासी क्षेत्रों में गुजरात का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। करीब 30-32 वर्ष बाद फरवरी में इस तहसील की पुनर्यात्रा का मौका मिला। इस संक्षिप्त यात्रा के आरंभ में कोटड़ा के वर्तमान परिदृश्य पर एक मार्के की टिप्पणी सुनने को मिली। क्षेत्र के एक सामाजिक कार्यकर्ता का कहना था,'कोटड़ा में जो थोड़ा-बहुत विकास दिखाई दे रहा है, यह भय का परिणाम है। मेरी उत्सुकता थी, 'वो कैसे? किस प्रकार का भय? उसका सहज उत्तर था, 'जिले की नौकरशाही नक्सलवादियों-माओवादियों से आतंकित है। इसे आशंका है कि यदि इस पिछड़ी तहसील में ईमानदारी के साथ विकास-कार्य नहीं किया गया तो इस इलाके में भी लघु रूप में झारखंड-छत्तीसगढ़ पनप सकते हैं। यह संक्षिप्त कथन कई संदेशों और चेतावनियों को ध्वनित करता है।

कोटड़ा दक्षिण राजस्थान की सबसे पिछड़ी तहसील है। जंगलों, पहाड़ों और पिछड़ेपन से घिरी। कहते हैं 1857 के असफल विद्रोह के पश्चात विद्रोही वीर तात्या टोपे के साथियों ने इस क्षेत्र में शरण ली थी। अंग्रेजों के विरुद्ध थोड़ी-बहुत गुरिल्ला कार्रवाइयां भी चलती रही थीं। यह इलाका अकाल और भूख की मार सहता रहा है। आज इसका नक्शा बदला-बदला दिखाई दे रहा है।

1978 में कोटड़ा पहुंचना जंग जीतने के समान था। जिला मुख्यालय उदयपुर से तहसील मुख्यालय कोटड़ा तक की दूरी तय करने में चार-पांच घंटे लग जाया करते थे। संकरी ऊबड़-खाबड़ सड़क पर इक्की-दुक्की बसें चला करती थीं, और वो भी कमर तोड़। आज न वैसी सड़कें हैं, न हिंडोला बसें। राष्ट्रीय मार्ग-76 के बन जाने से यह यात्रा डेढ़-दो घंटों में सिमट गई है। छह लेन है यह मार्ग। उदयपुर से 50-60 कि.मी. फासले पर देवला पड़ता है। वहां से कोटड़ा के लिए असली सफर शुरू होता है। अब यह मार्ग भी चौड़ा और डामर युक्त है जिस पर लग्जरी बसें, कारें, बड़ी जीपें, मोटर बाइक जैसे वाहन आपके स्थाई सहयात्री बन गए हैं। अब यह मार्ग उपभोक्ताओं के लिए है, न कि पैदलचियों, गाड़ीवानों, साइकिल सवारों और वनवासियों के लिए।

अब पहाड़ नंगे दिखाई दे रहे हैं। उनकी पीठ पर उभरी छिलाइयां उपभोक्ता सभ्यता की हिंसक भूख की कहानियां कह रही हैं। कभी इन पहाड़ों पर हरियाली छितराई हुई थी। पर अब 'जल-जंगल-जमीन के लुटेरों ने इसे पीड़ा से भर दिया है। 'आज ने 'बीते कल को गति से तो समृद्ध किया है, लेकिन इसका काफी कुछ हर भी लिया है ताकि 'आने वाला कल भौतिक रूप से समृद्धतर हो सके। फिर यह अहसास उभरता है कि कोटड़ा—झाड़ोल के जन-जल-जंगल-जमीन 'कल से कल तक की यात्रा से गुजर रहे हैं; इस संक्रांति काल की बिवाइयों से मुक्ति नहीं; ये अपरिहार्य हैं। फिर यह अहसास आपको 'विस्तार से जोड़ देता है। इस विस्तार में दंतेवाड़ा भी समाया हुआ है और झारखंड भी। एक पल में मैंने उन तमाम आदिवासी अंचलों की यात्रा कर डाली जहां आधुनिक राज्य ने कारपोरेट घरानों को जन-जल-जंगल-जमीन को रौंदने की छूट दे दी है या देने की प्रक्रिया में है। विकास अपरिहार्य है, पर इसका मूल्य कौन चुकाए? विकास का रूप कैसा हो? ये प्रश्न तो अभी अनुत्तरित हैं।

इन प्रश्नों के बीच एक सुखद अहसास भी होता है। मैं देख रहा हूं स्कूली पोशाक में बच्चे-बच्चियां टापरों से निकल रहे; हल्के बस्ते हवा में उड़ रहे हैं। यह दृश्य शृंखला का रूप ले लेता है और ताजा 'उपलब्धि की मेंट्री रास्ते भर करता है। 'उपलब्धि इसलिए कि सातवें दशक के अंतिम पहर में ऐसा दृश्य दुर्लभ था। बच्चे थे, पर नंग-धड़ंग। अपवाद स्वरूप ही किसी बच्चे को स्कूली पोशाक में देखा होगा। टापरा में टाबर (बच्चे) थे, पर स्कूल गुम था। आज टापरा हैं, टाबर हैं और स्कूल हैं। स्कूल जाती टोलियों में लड़कों के साथ लड़कियां भी शामिल हैं। भीलों में लड़कियों का स्कूल जाना किसी ऐतिहासिक यात्रा से कम नहीं है।

उदयपुर स्थित स्वयंसेवी संस्था (एन.जी.ओ) 'आस्था के निमंत्रण पर कोटड़ा जाना हो रहा है। आदिवासी विकास मंच द्वारा आयोजित 'आदिवासी वार्षिक सम्मेलन में शामिल होना है। इस निमंत्रण के पीछे भी एक कहानी है। आस्था के कर्ताधर्ता भंवर सिंह और उनके साथियों का अनुरोध था कि इस वर्ष आदिवासी सम्मेलन को संबोधित करूं। इसकी वजह यह थी कि मैं इस क्षेत्र के आदिवासियों के 'चेतना निर्माण और बंधुआ मुक्ति कार्यक्रम से जुड़ा रहा हूं। यहीं मैंने बंधक श्रमिक शिविर में अपनी चर्चित चेतना निर्माण एक्सरसाइज—'आओ शिकार करें, आओ नया गांव बसाएं को ठेठ देसी उपकरणों व प्रतीकों के माध्यम से विकसित किया था। भंवर सिंह और उनके साथियों ने बताया कि उन्होंने भीलों में जागृति पैदा करने के लिए इस एक्सरसाइज का खूब प्रयोग किया है। इस खेल को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड और राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में भी खिलाया गया है। (विस्तार के लिए देखें—आदिवासी समाज और शिक्षा; ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली)

क्या कभी मैं कल्पना कर सकता था कि कोटड़ा के मार्ग में मोबाइल टॉवर होंगे, टीवी टॉवर होगा; कोटड़ा कस्बे की दुकानों व घरों में टीवी सेटों से चिपके हुए लोग मिलेंगे; भीलों के कानों से मोबाइल सटे होंगे; भीलनियां ठेठ देसी अंदाज व बोली में बतिया रही होंगी; जगह-जगह रेस्तरां-कम-बीयर बार (स्थानीय लोग व्यंग्य में इसे 'वसुंधरा प्याऊ कहते हैं क्योंकि वसुंधरा राजे के कार्यकाल 2003-8 में देशी-अंग्रेजी शराब के बार खूब खुले थे) उग आए होंगे; बिलायती बीयर देसी बीयर (महुआ) को डकार जाएगी; सरकारी दफ्तरों-अमलों का जाल बिछा होगा; एन.जी.ओ. की संस्कृति कोटड़ा जीवन पर अमरबेल बन फैली मिलेगी।

कोटड़ा के लिए रवाना होने से पहले उदयपुर के आस्था ऑफिस में समन्वय निदेशक भंवर सिंह से एन.जी.ओ. के रोल और कोटड़ा-कायाकल्प को लेकर लंबी चर्चा हुई थी। आस्था के संस्थापक स्व. ओम श्रीवास्तव, भंवर सिंह, आर.डी.व्यास तथा उनके कुछ अन्य साथी कोटड़ा में कार्य आरंभ करने से पहले प्रसिद्ध एन.जी.ओ. 'सेवा-मंदिर से संबद्ध थे। लेकिन मतभेद के कारण 'आस्था की स्थापना हुई थी। वास्तव में यह मतभेद एक बड़े विमर्श का आयाम लिए हुए था। मुद्दा यह था कि एन.जी.ओ. का वैचारिक व कार्य चरित्र कैसा होना चाहिए? क्या एन.जी.ओ. को यथास्थितिवादी होना चाहिए या यथास्थिति विरोधी व परिवर्तनवादी? क्या एन.जी.ओ. को प्रतिवाद व प्रतिरोध की शक्ति से लैस रहना चाहिए या अनुनय-विनय-आवेदन-समर्पणवादी होना चाहिए? क्या
एन.जी.ओ. का कार्य निर्धारित विकास तक सीमित रहे या विकास प्रक्रिया में इसे हस्तक्षेप भी करना चाहिए?
इन सवालों से मुठभेड़ के दौरान यह बात खुलकर उभरी कि अधिकांश एन.जी.ओ. यथास्थितिवादी, औपचारिकतावादी, व्यवस्था सम्मत विकासवादी, हस्तक्षेप विरोधी और सुविधावादी होते हैं। इनका अपना अलग समानांतर सत्तातंत्र होता है। यह किसी सरकारी नौकरशाही से कम नहीं होता है। इसके पदाधिकारियों का अपना एक 'ग्लैमर जगत होता है। वे अपने ग्लैमर व सुविधा तंत्र को बनाए रखने के लिए खतरों-संकटों से पलायन करते रहते हैं और समझौतावादी बनते चले जाते हैं। ओम और उनके साथियों को इस कार्य शैली से असहमति थी...और जिसका परिणाम हस्तक्षेप सफल आस्था के जन्म के रूप में निकला।

चर्चा के दौरान भंवर सिंह ने बतलाया कि उन्होंने ग्रास रूट्स पर हस्तक्षेप कितना और किस प्रकार सफल हो सकता है, इसके लिए कोटड़ा को 'परीक्षण स्थल बनाया। पहले इस क्षेत्र की समस्याओं का अध्ययन किया ;अंतर्विरोधों को चिन्हित किया; संघर्ष की रणनीति तैयार की; लोगो को संगठित किया व चेतना संपन्न बनाया; जल-जंगल-जमीन के मुद्दों पर आंदोलन हुए; सफलताएं भी मिलीं और नाकामियां भी। आस्था के नेतृत्व में कोटड़ा में ही नहीं, दक्षिण राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में भी आंदोलन चले। आंदोलन का सिलसिला 1995 से शुरू हुआ तो आज तक चल रहा है। विगत 15 वर्षों में उदयपुर डिवीजन के विभिन्न क्षेत्रों में लोगो के शोषण, उत्पीडऩ, अन्याय व अत्याचार, सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को लेकर बहु-आयामी संघर्ष के नियमित प्रयोग किए गए हैं।

गौरतलब यह भी है कि संघर्षों के नेतृत्व के लिए इस जनजाति के लोगों को ही तैयार किया गया। भंवर सिंह का मत था कि बाहर से आरोपित नेतृत्व की अंतर्निहित सीमाएं होती हैं। वह एक सीमा से अधिक प्रभावी व उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता। बेहतर तो यही है कि भुक्तभोगी समाज से ही नेतृत्व पैदा हो। वही आंदोलन का परचम थामे। फिर से एन.जी.ओ. के कार्य-चरित्र की ओर लौटते हैं। भंवर सिंह के इस मत से किसे असहमति हो सकती है कि इस तरह की संस्थाएं मूलत: 'उफनते दूध में ठंडे पानी की बूंद की भूमिका निभाती हैं। सैद्धांतिक दृष्टि से इसे 'अंतर्विरोधों का डिफ्यूजन ' कहा जाता है। अर्थात् किसी समस्या या टकराव के वैज्ञानिक समाधान के बजाए उसका अधबीच में तात्कालिक हल निकालना। इससे पहले कि समस्या यथास्थिति के लिए चुनौती बने, उसके समाधान की तार्किक परिणति से उसे भटका देना। डिफ्यूजन की शैली शासक वर्ग को काफी रास आती है। स्वयं सेवी संस्थाएं शासक वर्ग के लिए एक प्रकार से अग्रिम पंक्ति के 'सॉफ्ट वेपन का रोल अदा करती हैं। इसका लाभ राष्ट्रीय और वैश्विक शासक वर्गों को मिलता भी है।

यह अकारण नहीं है कि तीसरी दुनिया में सक्रिय लाखों एन.जी.ओ. को यूरो-अमेरिकी राष्ट्रों से भरपूर मात्रा में धन मिलता है। भारत के सभी क्षेत्रों में आज एन.जी.ओ. का नेटवर्क मौजूद है। जहां इन्हें सरकार से अनुदान मिलता है, वहीं अमीर देशों में स्थित डोनर एजेंसियों से विभिन्न रूपों में फंड भी प्राप्त होते हैं। ऐसी भी संस्थाएं हैं जो सिर्फ विदेशी धन पर ही जिंदा हैं। वे सरकारी धन लेना पसंद नहीं करती हैं। पिछले कुछ वर्षों से इन संस्थाओं को भारतीय कारपोरेट हाउसों से भी धन प्राप्त होने लगा है।

इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर विवाद भी उठे हैं। इनके माध्यम से विदेशी शक्तियां पिछड़े देशों के 'सोशल कल्चरल-पॉलीटिकल डेटा हासिल करती हैं। इन डेटा में सामाजिक तनाव, धार्मिक व जातिगत टकराव, जनजाति अस्मिता उभार, राजनीतिक असंतोष, आर्थिक विषमता, लोगों की क्रय-विक्रय क्षमता, राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के प्रति दृष्टिकोण जैसे बेशुमार विषय शामिल हैं। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि वैश्विक पूंजी की एक लॉबी जहां बड़े बांधों के निर्माण का समर्थन करती है तो दूसरी लॉबी उन संस्थाओं को धन देती है जो बड़े बांधों के निर्माण के विरुद्ध आंदोलनरत हैं। सारांश यह है कि एन.जी.ओ. 'गैर-सैन्य सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण अंग है। यह भी सही है कि जेनुइन स्वयं सेवी संस्थाएं सकारात्मक भूमिका भी निभाती हैं। समाज की समझ को पैना करती हैं। यह सच भी है कि एन.जी.ओ. को देश की वर्तमान व्यवस्था द्वारा स्वीकृत दायरे के अंतर्गत ही अपनी कार्रवाइयां करनी होती हैं। राज्य की एन.जी.ओ. तंत्र से अपेक्षा रहती है कि यह राजनीति से स्वयं को दूर रखेगा और रचनात्मक कार्यों के माध्यम से विकास एवं परिवर्तन की गतिविधियां संचालित करेगा। वह ऐसी विचारधारा और कार्यों से दूर रहेगा जो कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक अस्थिरता व सामाजिक असंतोष का आधार बन सकती हैं।

जाहिर है कोई भी एन.जी.ओ. राज्य का कोपभाजन बनना नहीं चाहेगा। यदि वह ऐसा करता है तो उसके आर्थिक स्रोत (देशी व विदेशी) प्रभावित हो सकते हैं। अत: तयशुदा दायरे के भीतर रह कर ही एन.जी.ओ. काम करते हैं। जब तक वे ऐसा करते हैं देश का शासक वर्ग निश्ंिचत रहता है। जब वे अपनी सीमा लांघने लगते हैं
तब इस वर्ग को बेचैनी होती है। जाहिर है जो रेडिकल एन.जी.ओ. होते हैं वे शासक वर्ग की सीमा को तोड़ेंगे भी। उनकी कोशिश रहेगी राज्य के चरित्र के रेडिकल बदलाव की, एक समतावादी व्यवस्था व परिवेश के निर्माण की। वे अपने संघर्ष, अपनी गतिविधियों को उस छोर तक पहुंचा भी देते हैं जहां से रेडिकल राजनीति की यात्रा शुरू होती है। यह व्यापक आयाम वाली यात्रा होती है। बुनियादी मुद्दा यह है कि एन.जी.ओ. को राज्य व्यवस्था के 'अनौपचारिक अंगÓ के रूप में ही क्यों काम करना चाहिए? जब एन.जी.ओ. जल-जंगल-जमीन, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, स्त्री सशक्तिकरण, रोजी-रोटी अधिकार, असंगठित श्रमिक, बाल श्रमिक, न्यूनतम मजदूरी, मानव अधिकार, दलित व आदिवासी सशक्ति-करण, भूमि सुधार, बहुराष्ट्रीय निगमों का विरोध, वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन, सांप्रदायिकता विरोधी अभियान, फासीवाद विरोधी अभियान, जैसे सरोकार वाले क्षेत्रों से जुड़ेगा तो उसे इन व्याधियों के कारणों की गहराई में उतरना ही होगा। उसे 'कारण और प्रभावÓ के अंतर्संबंधों को समझना ही पड़ेगा। किसानों की आत्महत्या के मूल कारणों को समझे बगैर कोई एन.जी.ओ. अपने काम के साथ कैसे न्याय कर सकता है? जल-जंगल-जमीन की लुटाई कौन कर रहा है?, इससे किसे फायदा पहुंच रहा है?, खनिज संपदा के अवैध दोहन को किसका संरक्षण प्राप्त है?, इन सवालों से एन.जी.ओ. को टकराना ही पड़ेगा। जब वह इनसे टकराएगा तब सत्ता प्रतिष्ठान के छोटे-बड़े कारिंदों से मुठभेड़ें अपरिहार्य हैं। ऐसा करने से एन.जी.ओ. को अपने जन सरोकारों के साथ न्याय करने का सुखद संतोष जरूर प्राप्त होगा। राज्य का गुस्सा उस पर नहीं टूटेगा, इससे इंकार नहीं है। लेकिन किसी स्तर पर वह बदलाव का वाहक बनेगा, क्या यह कम है?

जब इस अनौपचारिक संवाद की गहमा-गहमी से ध्यान छिटक कर सामने की तरफ गया तो देखा मैदान पर आदिवासी परिधानों का बसंत उतर आया है। औरतों ने मरदों को तादाद में मात दे रखी है। इन औरतों का उत्साह देखते ही बनता है। मैं अपनी पहली यात्रा की स्मृतियों की आहट सुन रहा हूं। 32 वर्ष पहले इनकी काया कपड़ों से इतनी लकदक नहीं हुआ करती थी। तन पर फटे-पुराने कपड़े रहा करते थे। औरतों में इतना चमक धमक नहीं था। उभरते बाजार का प्रभाव साफ झलकता है। मरदों की देह-भाषा भी बाजार-प्रभावों की गवाही है। युवकों की कलाइयों पर घडिय़ां हैं। पहले इनकी काया पर परंपरागत गोदन प्रमुखता से हुआ करते थे। अब रागदरबारी के छैलाओं की झलक देखी जा सकती है। शहरी बनने की होड़ में वे शामिल दिखाई देते हैं। आइए, इस मानवता को और समीप से देखते हैं। इस दृश्य के नेपथ्य में भी झांकते हैं। क्या यथार्थ इतना ही सुंदर-सफल-शाइनिंग है, इसे भी तो समझ लें। कोटड़ा बाजार से इस सम्मेलन-स्थल की ओर आ रहा था, तब एक भफल बालक टकराया। मेरे साथ उदयपुर से प्रकाशित समता संदेश के संपादक हिम्मत सेठ भी थे। बालक की आयु 10-12 वर्ष की रही होगी। वह कोटड़ा तहसफल के किसी गांव का था। सिर पर बोझ था, सामान की गठरी रखी हुई थी। नंगे पांव था। आधा जिस्म लगभग उघड़ा हुआ। आंखें धंसने को तैयार थीं। हमसे रहा नहीं गया। चलते-चलते कुछ पूछ ही लिया। उसने भयमिश्रित भाव से अपनी छोटी-मोटी कहानी यूं रखी, अपनी बोली मेें : ''मेरा नाम रमेश है। मैं यहां एक दुकानदार के यहां काम करता हूं। सुबह आठ बजे से रात के नौ बजे तक काम करता हूं। सेठ का सामान ढोना पड़ता है। कोई छुट्टïी नहीं होती है। स्कूल नहीं जा सका। मजूरी से अपना और माता-पिता का पेट पालता हूं। सेठ मुझे दिन में खाना देता है। चाय पिलाता है और 20 रुपए रोजाना देता है। मेरे जैसे कई टाबर (बच्चे) कोटड़ा में काम करते हैं।''

इस कहानी के साथ-साथ 'बाल श्रम' की एक और कहानी का भी पता चला। कोटड़ा कस्बा 'काली सिंध' नदी के किनारे बसा हुआ है। यह नदी कोटड़ा और गुजरात के बीच बहती है। मफलों बहकर यह नदी साबरमती में समा जाती है। सीमांत क्षेत्र होने के कारण गुजराती भाषा की छाप यहां देखी जा सकती है। गुजरात नंबर प्लेट के अनेक वाहन कोटड़ा में देखे जा सकते हैं। एक मायने में क्षेत्र के भीलों की अर्थव्यवस्था गुजरात से भी जुड़ी है। नदी के दोनों छोर के लोगों की आवाजाही रहती है। काम धंधा चलता रहता है। गुजरात में कपास की खेती प्रचुर मात्रा में होती है। कपास के फूल तोडऩे के लिए कोमल उंगलियों को काफी उपयोगी माना जाता है। जाहिर है, कपास की खेती में 'बाल श्रमिकोंÓ की काफी खपत है। इस खपत को कोटड़ा क्षेत्र के आदिवासी बाल श्रमिकों से पूरा किया जाता है। बच्चों के माता-पिता गुजरात के धनी किसानों या श्रम ठेकेदारों से अग्रिम धन ले लेते हैं और अपने बच्चों को स्कूल के बजाए उनके हवाले कर देते हैं। ऐसे बच्चों से खेतों में हाड़-तोड़ श्रम लिया जाता है। उनका बचपन, किशोरपन जल्द ही लुप्त हो जाता है।

सम्मेलन में मौजूद जिलाधीश ने इस बाल श्रम के बारे में स्वीकार भी किया। उन्होंने यह भी बतलाया कि इसकी रोकथाम के कई उपाय किए गए हैं। लेकिन धनी किसान व ठेकेदार भी कम चालाक नहीं हैं। उन्होंने सस्ती दरों पर बाल श्रम का शोषण जारी रखने के लिए ऐसी तरकीब ईजाद की है कि हमारा प्रशासन भी लाचार है। अब ये किसान गरीब भफलों से कोटड़ा में ही कपास की खेती करवाते हैं। भफलों के खेतों को इस्तेमाल में लाया जाता है। जब कपास की फसल तैयार हो जाती है तब आदिवासियों के बच्चों को इस काम में जोत दिया जाता है। अपने ही खेत पर काम करने से बच्चे को कैसे रोका जा सकता है? इस प्रकार 'बाल श्रमÓ इस क्षेत्र में मौजूद है। फिर भी प्रशासन इस नई समस्या के हल का उपाय भी तलाश रहा है। जिलाधीश ने चर्चा में यह भी माना कि इस क्षेत्र में स्कूलों की हालत ठीक नहीं है। शिक्षक गायब रहते हैं। वैसे 51 फीसदी शिक्षकों और 25 फीसदी प्रिंसीपलों का अभाव इस इलाके में है। इस जानकारी से सतह के नीचे की सच्चाई स्वत: स्पष्ट है। जहां 'बाल श्रमिक' हैं, वहीं 'ड्राप आउट' भी रहेंगे ही। दोनों समस्याओं का संबंध निर्धनता व लाचारी से है।

1978 में कोटड़ा और झाड़ोल क्षेत्रों में 'हाली प्रथा' (बंधक श्रमिक प्रथा) काफी प्रचलित थी। राष्ट्रीय श्रम संस्थान द्वारा आयोजित 'चेतना निर्माण शिविर' में 50-60 हालियों ने भाग लिया था। वे महाजनों, सूदखोरों, जमींदारों के बोझ तले दबे थे। क्षेत्र में काफी भूमिहीनता थी। विभिन्न हथकंडों से गैर-आदिवासियों के हाथों में भफलों की भूमि खिसक जाया करती थी। आज इस स्थिति में सुधार माना जाता है। हाली प्रथा पर अंकुश लगा हुआ हैपर यह पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है। घंटों चले इस सम्मेलन में आदिवासियों ने मंच से अपने शोषण के नए-नए रूपों की शिकायतें भी सामने रखीं। इन शिकायतों में वन अधिकार कानून, 2006 व 2008 के क्रियान्वयन में व्याप्त भ्रष्टाचार; आदिवासियों को वनभूमियों का पट्टïा न देना; लघु वन उपजों पर डाका; बाहरी ठेकेदार व्यापारियों व कर्मचारियों द्वारा लूट-खसोट; मिलीभगत से कृषि व वन उपज का कम मूल्य लगाना; महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी रोजगार योजना में व्याप्त फर्जीवाड़ा व भेदभाव; सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दुरुपयोग; दबंगों द्वारा इसका दोहन और गरीबों को लाभ से वंचित रखना; राशन कार्डों में मनमानी व घूसखोरी; प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से डॉक्टरों और स्कूलों से शिक्षकों का गायब रहना; स्कूल भवनों की कमी; फॉरेस्ट गार्ड, सिपाही, राजस्व अधिकारी का आतंक; स्वच्छ पेय जल की कमी; लिंक रोड का अभाव; अंधाधुंध शराब बिक्री; नशीले पदार्थों का बोलबाला; ऋण ग्रस्तता व सूदखोरी; काम का अभाव जैसी पीड़ाएं शामिल हैं।

सम्मेलन में आदिवासियों की आत्मलोचनात्मक दृष्टि के भी दर्शन हुए। जहां प्रतिभागियों ने शासन-प्रशासन की तीखी आलोचना की, वहीं अपने समाज में व्याप्त बुराइयों को लेकर समाज-नेतृत्व की भी खिंचाई की। इन बुराइयों में बहुपत्नी प्रथा, बाल-विवाह, डाकण-डायन, चुड़ैल, स्त्रियों का शोषण, मौताणा (किसी के असामयिक ढंग से मरने पर सामूहिक भोज लेना), शराब खोरी, दापा (वधू मूल्य), अशिक्षा व अन्य पिछड़ापन जैसी घटनाएं शामिल हैं। 1978 के चेतना शिविर में भी आदिवासियों ने अपने आंतरिक (समाजगत) और बाहरी शत्रुओं की पहचान की थी। संतोषजनक बात यह है कि यह चेतना जीवित ही नहीं है बल्कि इसमें नए आयाम भी जुड़े हैं।

सरकार और योजना चिंतकों को याद रखना चाहिए कि विगत तीन दशकों में विकास एवं आधुनिकीकरण के पैमाने बदले हैं। इस क्षेत्र के उत्पीडि़त लोगों में नई चेतना व आकांक्षाएं अंकुरित होने लगी है। अब ये अपने परिवेश जगत की शहरी जीवन से तुलना करने लगे हैं। 1978 में आज जैसी कई शिकायतें और मांगें नहीं थीं। पीड़ाएं सीमित थीं। पर आज ऐसा नहीं है। इनमें विवेचनात्मक व तुलनात्मक बोध जन्मा है। यह एक सकारात्मक परिणाम है। इसके साथ ही यह एक सार्विक प्रक्रिया भी है। इस प्रक्रिया के प्रभावों को छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र जैसे राज्यों के दूर-दराज आदिवासी अंचलों में भी देखा जा सकता है। निस्संदेह इस क्षेत्र के आदिवासियों की तुलना में झारखंड, उड़ीसा, बस्तर जैसे इलाकों के आदिवासियों का शोषण-उत्पीडऩ कई-कई गुना अधिक है। वहां खनिज व वन संपदा का दोहन भी निर्ममता के साथ हुआ है इसीलिए वहां अंतर्विरोध अधिक गहरे व पैने हैं। यही कारण है कि वहां अंतर्विरोधों के वैज्ञानिक समाधान के लिए संघर्ष भी है। वहां के अरण्य सुलगे हुए हैं। पर यहां शांत हैं। लेकिन ये कभी अशांत नहीं होंगे, यह कौन दावा कर सकता है।
नई दखल से साभार 

Wednesday, 29 June 2011

बोल के लब आज़ाद हैं तेरे ..........

वो नहीं बोलते हैं तो ख़बर है। बोलते हैं तो ख़बर है। लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है, यह भी ख़बर है। ख़बर कम है। लोकतंत्र का अपमान ज़्यादा। क्या आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने नहीं आता है। फिर वो क्लास में अपने छात्रों को कैसे पढ़ाते होंगे। अधिकारियों के साथ मीटिंग करते वक्त तो बोलते ही होंगे। अपनी राय तो रखते ही होंगे। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया भर के अनुभवों वाला एक शख्स रबर स्टाम्प ही बना रहे। विश्वास करना मुश्किल होता है। कोई ज़बरदस्ती चुप रह कर यहां तक नहीं पहुंच सकता। कुछ तो उनकी अपनी राय होगी,जिससे उनके धीमे सुर में ही सही बोलते वक्त लगता होगा कि आदमी योग्य है। वर्ना मुंह न खोलने की शर्त पर उनकी योग्य छवि कैसे बनी। मालूम नहीं कि ज़िद में आकर मनमोहन सिंह नहीं बोलते या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है। दोनों ही स्थिति में मामला ख़तरनाक लगता है।

जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।

लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं?

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है।

मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना समझने लगे हैं.
साभार -रविश कुमार

Sunday, 26 June 2011

स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें ......

मादक पदार्थों व नशीली वस्तुओं के निवारण हेतु संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 7 दिसंबर, 1987 को प्रस्ताव संख्या 42/112 पारित कर हर वर्ष 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस मानाने का निर्णय लिया. यह एक तरफ लोगों में चेतना फैलाता है, वहीँ नशे के लती लोगों के उपचार की दिशा में भी सोचता है.इस वर्ष का विषय है- ''स्वास्थ्य के बारे में सोचें, नशे को न कहें." आजकी पोस्ट इसी विषय पर-

मादक पदार्थों के नशे की लत आज के युवाओं में तेजी से फ़ैल रही है. कई बार फैशन की खातिर दोस्तों के उकसावे पर लिए गए ये मादक पदार्थ अक्सर जानलेवा होते हैं. कुछ बच्चे तो फेविकोल, तरल इरेज़र, पेट्रोल कि गंध और स्वाद से आकर्षित होते हैं और कई बार कम उम्र के बच्चे आयोडेक्स, वोलिनी जैसी दवाओं को सूंघकर इसका आनंद उठाते हैं. कुछ मामलों में इन्हें ब्रेड पर लगाकर खाने के भी उदहारण देखे गए हैं. मजाक-मजाक और जिज्ञासावश किये गए ये प्रयोग कब कोरेक्स, कोदेन, ऐल्प्राजोलम, अल्प्राक्स, कैनेबिस जैसे दवाओं को भी घेरे में ले लेते हैं, पता ही नहीं चलता. फिर स्कूल-कालेजों य पास पड़ोस में गलत संगति के दोस्तों के साथ ही गुटखा, सिगरेट, शराब, गांजा, भांग, अफीम और धूम्रपान सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं के सेवन की ओर अपने आप कदम बढ़ जाते हैं. पहले उन्हें मादक पदार्थ फ्री में उपलब्ध कराकर इसका लती बनाया जाता है और फिर लती बनने पर वे इसके लिए चोरी से लेकर अपराध तक करने को तैयार हो जाते हैं.नशे के लिए उपयोग में लाई जानी वाली सुइयाँ HIV का कारण भी बनती हैं, जो अंतत: एड्स का रूप धारण कर लेती हैं. कई बार तो बच्चे घर के ही सदस्यों से नशे की आदत सीखते हैं. उन्हें लगता है कि जो बड़े कर रहे हैं, वह ठीक है और फिर वे भी घर में ही चोरी आरंभ कर देते हैं. चिकित्सकीय आधार पर देखें तो अफीम, हेरोइन, चरस, कोकीन, तथा स्मैक जैसे मादक पदार्थों से व्यक्ति वास्तव में अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है एवं पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। ये ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिनकी लत के प्रभाव में व्यक्ति अपराध तक कर बैठता है। मामला सिर्फ स्वास्थ्य से नहीं अपितु अपराध से भी जुड़ा हुआ है. कहा भी गया है कि जीवन अनमोल है। नशे के सेवन से यह अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में भारत हेरोइन का सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है और ऐसा लगता है कि वह खुद भी अफीम पोस्त का उत्पादन करता है. गौरतलब है कि अफीम से ही हेरोइन बनती है. अपने देश के कुछ भागों में धड़ल्ले से अफीम की खेती की जाती है और पारंपरिक तौर पर इसके बीज 'पोस्तो' से सब्जी भी बने जाती है. पर जैसे-जैसे इसका उपयोग एक मादक पदार्थ के रूप में आरंभ हुआ, यह खतरनाक रूप अख्तियार करता गया. वर्ष 2001 के एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में भारतीय पुरुषों में अफीम सेवन की उच्च दर 12 से 60 साल की उम्र तक के लोगों में 0.7 प्रतिशत प्रति माह देखी गई. इसी प्रकार 2001 के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार ही 12 से 60 वर्ष की पुरुष आबादी में भांग का सेवन करने वालों की दर महीने के हिसाब से तीन प्रतिशत मादक पदार्थ और अपराध मामलों से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय [यूएनओडीसी] की रिपोर्ट के ही अनुसार भारत में जिस अफीम को हेरोइन में तब्दील नहीं किया जाता उसका दो तिहाई हिस्सा पांच देशों में इस्तेमाल होता है। ईरान 42 प्रतिशत, अफगानिस्तान सात प्रतिशत, पाकिस्तान सात प्रतिशत, भारत छह प्रतिशत और रूस में इसका पांच प्रतिशत इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2008 में 17 मीट्रिक टन हेरोइन की खपत की और वर्तमान में उसकी अफीम की खपत अनुमानत: 65 से 70 मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। कुल वैश्विक उपभोग का छह प्रतिशत भारत में होने का मतलब कि भारत में 1500 से 2000 हेक्टेयर में अफीम की अवैध खेती होती है, जो वाकई चिंताजनक है.

नशे से मुक्ति के लिए समय-समय पर सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएं पहल करती रहती हैं. पर इसके लिए स्वयं व्यक्ति और परिवार जनों की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण है. अभिभावकों को अक्सर सुझाव दिया जाता है कि वे अपने बच्चों पर नजर रखें और उनके नए मित्र दिखाई देने, क्षणिक उत्तेजना या चिडचिडापन होने, जेब खर्च बढने, देर रात्रि घर लौटने, थकावट, बेचैनी, अर्द्धनिद्राग्रस्त रहने, बोझिल पलकें, आँखों में चमक व चेहरे पर भावशून्यता, आँखों की लाली छिपाने के लिए बराबर धूप के चश्मे का प्रयोग करते रहने, उल्टियाँ होने, निरोधक शक्ति कम हो जाने के कारण अक्सर बीमार रहने, परिवार के सदस्यों से दूर-दूर रहने, भूख न लगने व वजन के निरंतर गिरने, नींद न आने, खांसी के दौरे पड़ने, अल्पकालीन स्मृति में ह्रास, त्वचा पर चकते पड़ जाने, उंगलियों के पोरों पर जले का निशान होने, बाँहों पर सुई के निशान दिखाई देने, ड्रग न मिलने पर आंखों-नाक से पानी बहने-शरीर में दर्द-खांसी-उल्टी व बेचैनी होने, व्यक्तिगत सफाई पर ध्यान न देने, बाल-कपड़े अस्त व्यस्त रहने, नाखून बढे रहने, शौचालय में देर तक रहने, घरेलू सामानों के एक-एक कर गायब होते जाने आदत के तौर पर झूठ बोलने, तर्क-वितर्क करने, रात में उठकर सिगरेट पीने, मिठाईयों के प्रति आकर्षण बढ जाने, शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार गिरावट आते जाने, स्कूल कालेज में उपस्थिति कम होते जाने, प्रायः जल्दबाजी में घर से बाहर चले जाने एवं कपडों पर सिगरेट के जले छिद्र दिखाई देने जैसे लक्षणों के दिखने पर सतर्क हो जाएँ. यह बच्चों के मादक-पदार्थों का व्यसनी होने की निशानी है. यही नहीं यदि उनके व्यक्तिगत सामान में अचानक माचिस,मोमबत्ती,सिगरेट का तम्बाकू, 3 इंच लम्बी शीशे की ट्यूब,एल्मूनियम फॉयल, सिरिंज, हल्का भूरा सफेद पाउडर मिलता है तो निश्चित जान लें कि वह ड्रग्स का शिकार है और तत्काल इस सम्बन्ध में कदम उठाने की जरुरत है.

मादक पदार्थों और नशा के सम्बन्ध में जागरूकता के लिए तमाम दिवस, मसलन- 31 मई को अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय नशा व मादक पदार्थ निषेध दिवस, गाँधी जयंती पर 2 से 8 अक्टूबर मद्यनिषेध सप्ताह और 18दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में हर साल मनाया जाता है. मादक पदार्थों का नशा सिर्फ स्वास्थ्य को ही नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक- मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी इसका प्रभाव परिलक्षित होता है. जरुरत इससे भागने की नहीं इसे समझने व इसके निवारण की है. मात्र दिवसों पर ही नहीं हर दिन इसके बारे में सोचने की जरुरत है अन्यथा देश की युवा पीढ़ी को यह दीमक की तरह खोखला कर देगा.
साभार - शब्द-शिखर 

Friday, 24 June 2011

माओवाद से आगे जाते आंदोलन......


अगर अल्ट्रा लेफ्ट यानी नक्सलवाद से लेकर माओवाद हिंसा की जगह अहिंसा की शक्ल में आये तो उसका चेहरा क्या होगा। जाहिर है हिंसा का मतलब है व्यवस्था परिवर्तन के लिये पहले सत्ता परिवर्तन ही है। जिसमें राज्य से दो-दो हाथ करने की स्थिति आती ही है। और नक्सलवाद से लेकर माओवाद का चेहरा चाहे किसान-आदिवासी के सवाल को लेकर खड़ा हो या नयी परिस्थितियों में जमीन से लेकर विकास की बाजारवादी सोच को मुद्दा बनाकर संघर्ष की स्थिति पैदा करने वाला हो, लेकिन शुऱुआत सत्ता परिवर्तन से ही होती है। जबकि अहिंसा का मतलब है सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन।

यानी यहां चल रही सत्ता को सिर्फ इतनी ही चेतावनी दी जाती है कि जो व्यवस्था उसने अपनायी हुई है वह सही नहीं है। और संघर्ष का यह चेहरा व्यवस्था परिवर्तन उसी घेरे में चाहता है, जिसमें सत्ता चल रही है। लेकिन,इस व्यवस्था परिवर्तन के संघर्ष को क्या अल्ट्रा लेफ्ट यानी नक्सलवाद से माओवाद की किसी श्रेणी में अगर नही रखा जा सकता, तो इसका किस रूप में मान्यता दी जाये। असल में अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का संघर्ष, मुद्दों को लेकर सत्ता को चेताने वाले संघर्षों में एक नया सवाल है।

यहां यह कहा जा सकता है कि भ्रष्‍टाचार और कालेधन के मुद्दे, संसदीय राजनीति ने भी उठाये हैं। और अन्ना हजारे या बाबा रामदेव के सवाल चुकी हुई संसदीय राजनीति पर महज एक सवालिया निशान भर है। लेकिन, संसदीय राजनीति ने हमेशा चुनावी राजनीति को महत्ता दी। संसद को हर मुद्दे के समाधान का रास्ता करार दिया। जवाहरलाल नेहरु पर लोहिया ने जब भ्रष्‍टाचार के आरोप जड़े, तो गैर कांग्रेसवाद से आगे संघर्ष की लकीर ना खिंच सकी। इंदिरा गांधी की सत्ता के भ्रष्ट तौर-तरीकों को लेकर जब जेपी ने आंदोलन की शुरुआत की, तो भी कांग्रेस की सत्ता के खिलाफ विरोधी राजनीतिक दलों का एक मंच जनता पार्टी के तौर पर निकला। वीपी सिंह ने भी जब बोफोर्स घोटाले के घेरे में राजीव गांधी की सत्ता को घेरा, तो भी संसदीय राजनीति के घेरे में ही सत्ता परिवर्तन का ही चेहरा समूचे संघर्ष में उभरा। लेकिन, अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने चाहे संसदीय राजनीति में उठ चुके सवालों को मुद्दों में बदला, लेकिन पहली बार उसका रास्ता भी संसदीय राजनीति से इतर खोजने की सोच भी पैदा की।

सत्ताधारी दल के तार भ्रष्टाचार से जुड़ने के बाद कालेधन के जरिये संसदीय राजनीति का खेल कैसे खेला जाता है,यह सवाल भी उठा। और पहली बार तमाम राजनीतिक दलों के सामने यह बड़ा सवाल गूंजा कि अगर संसदीय चुनावी राजनीति का चेहरा ही पूंजी पर टिका है और पूंजी का मतलब भ्रष्टाचार या कालेधन को प्रश्रय देना है, तो फिर मुद्दा चाहे पुराना हो, लेकिन उसके सवाल नये हैं और रास्ता भी नया खोजना जरूरी है। असल में यह समझ आंदोलन के बीच में सत्ताधारी दल से लेकर तमाम राजनीतिक दलों की आपसी एकजुटता से भी निकली और आंदोलन से टकराव ने भी इन सवालों को जन्म दिया। खासकर सिविल सोसायटी ने जन- लोकपाल कानून के जरिये जिस तरह कानून पर टिके संसदीय लोकतंत्र पर ही सवालिया निशान लगाया।

लोकतंत्र का नारा लगाते संसदीय दलों को भी समझ नही आया कि जो काम संसद को करना है अगर उसका मसौदा संसद के बाहर तय होने लगे, उस पर बहस बिना राजनीतिक दलों की शिरकत के होने लगे, अगर सडक पर संसद के तौर-तरीको को लेकर आम आदमी संघर्ष की शक्ल में अपनी सहमति सिविल सोसायटी को लेकर देने लगे, तो फिर चुनावी लोकतंत्र पर देश ठहाके नहीं लगायेगा तो और क्या करेगा। और अगर ऐसा होगा तो फिर आंदोलन की बोली भी व्यवस्था परिवर्तन की ऐसी लकीर खिंचने वाली होगी जिसमें यह तयकर पाना वाकई मुश्किल होगा कि संघर्ष सिर्फ वयवस्था के तौर-तरीको को बदलने वाला है या फिर सत्ता की नुमाइन्दगी करने के लिये बैचैन राजनीतिक दलों के खिलाफ संघर्ष की मुनादी हो रही है। यानी जो नक्सलवाद से लेकर माओवाद के नारे नक्सलबाडी से लेकर तेलागांना और हाल के दिनों में बस्तर से लेकर नंदीग्राम और लालगढ़ में सुनायी दिये वही अहिंसा की आवाज की शक्ल में दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान और आखिर में राजघाट तक भी सुनायी पड़े। क्योंकि दिल्ली के इन लोकतांत्रिक मंचो को संसदीय लोकतंत्र ने ही खुद को लोकतांत्रिक बताने-ठहराने के लिये बनाया है, तो यहां की आवाज में विरोध के स्वर विद्रोह के नहीं लगते है। और इससे पहले इसी का जश्न संसदीय सत्ता मनाती आयी है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दंभ भी भरती रही है।

लेकिन पहली बार अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने उन्हीं प्रतीकों को जड़ से पकड़ा। कहा यह भी जा सकता है कि खेल - खेल में संसदीय लोकतंत्र के यह प्रतीक पकड़ में आ गये। रामदेव का मतलब चूंकि रामलीला मैदान रहा और रामलीला मैदान जेपी से लेकर वीपी तक के संघर्ष की मुनादी स्थल रहा है। संघ परिवार की दस्तक खुले तौर पर नजर आने के बाद संसदीय सत्ता रामलीला मैदान के जरिये संघ परिवार के भगवापन को रामदेव के बाबापन से जोड़कर अपने उपर उठने वाली अंगुली को सियासी दांव तले दबा सकती है। चूंकि बाबा रामदेव की रामलीला का जुड़ाव भी आस्था और भगवा रहस्य में ज्यादा खोया रहा, इसलिये इस संघर्ष को राजनीतिक तीर बनाने में सफलता कितनी किस रूप में मिलती यह तो दूर की गोटी है।

लेकिन रामलीला मैदान में संसदीय राजनीतिक दलों की अलोकतांत्रिक भूमिका को लेकर जो सवाल बाबा रामदेव ने उठाये और जिस तरह व्यवस्था परिवर्तन की बात कहते हुये सत्ता के तौर-तरीकों पर परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर निशाना साधा। कैबिनेट, रामदेव मंत्रियों से रामदेव की हुई बातचीत को भी कितना जनविरोधी करार करने के लिये दबाव बना रही है, इसे सार्वजनिक मंच पर जिस तेवर से कहा, उसमें यह सवाल कोई भी पूछ सकता है कि अगर यह तेवर कोई माओवादी दिखाता तो वह राष्ट्रविरोधी करार दिया जा सकता था। वही अन्ना हजारे की जंतर-मंतर की सभा हो या राजघाट की, दोनों जगहों पर ना सिर्फ मंच से बल्कि सार्वजनिक तौर अलग-अलग सामाजिक संगठनो से लेकर निजी पहल करते आम शहरी मध्यम वर्ग ने प्ले-कार्ड से लेकर नारों की शक्ल में जो-जो कहा, अगर उस पर गौर करें तो नंदीग्राम से लेकर बस्तर तक में जो आवाज सत्ता के खिलाफ जिन शब्दों को लेकर उठती है, उससे कहीं ज्यादा तल्खी इनकी आवाजों में थी। शब्दों में थी। खासकर विकास का जो खांचा 1991 के बाद से देश में आर्थिक सुधार के नाम पर अपनाया जा रहा है, उसका चेहरा ही भ्रष्ट है तो फिर भ्रष्टाचार पर नकेल कैसे कसी जा सकती है।

यह सवाल भी सिविल सोसायटी ने उठाया। और इस दौर में माओवाद के राजनीतिक घोषणा पत्र में जब समूची विकास प्रक्रिया को ही चंद हथेलियों में पूंजी समेटने वाला करार दिया है, उसी भाषा में भ्रष्टाचार पर फंदा भी अन्ना हजारे ने कसे। इतना ही नही, किसानों,आदिवासियों के जिन मुद्दों को लेकर नंदीग्राम में आग सुलगी और वामपंथियों को कटघरे में खड़ा किया गया उसी तरह सिविल-सोसायटी ने भी जनलोकपाल की बैठकों में सरकार पर यह कहकर नकेल कसी कि इसके दायरे में किसी को भी बख्शने का मतलब होगा भ्रष्टाचार करने का लाईसेंस देना। वामपंथियों ने सत्ता पर रहते हुये ममता बनर्जी पर यही सवाल उठाये थे कि जब जनता ने उन्हें चुना है तो वह जनता के खिलाफ कैसे जा सकते हैं और फैसला भी जनता को ही करना होगा।

जाहिर है बंगाल में वामपंथियों के विकल्प के लिये ममता उसी रास्ते पर खड़ी थी जिसे वामपंथियो ने चुना था। संसदीय चुनाव का रास्ता। और बंगाल में तो कानून के लिये राष्ट्रविरोधी माओवादी भी चुनाव के जरिये परिवर्तन के पक्ष में थे। लेकिन दिल्ली में सिविल सोसायटी ने तो अल्ट्रा लेफ्ट या कहे माओवादियों से भी आगे के सवाल सरकार के साथ एक ही टेबल पर बैठ कर उठा दिये। असल में पहली बार सबसे बड़ा सवाल देश के लिये यही खड़ा हो रहा है कि क्या संसदीय राजनीति अपनी भूमिका निभा चुका है। क्या संसदीय राजनीति के सरोकार आम आदमी से पूरी तरह खत्म हो चुके है। क्या समूची चुनावी प्रक्रिया को देश का शहरी वर्ग धोखा मान चुका है। यह सारे सवाल इसलिये जरूरी हैं क्योंकि सिविल सोसायटी के उठाये सवाल इससे पहले नक्सली या माओवादी भी नहीं कह पाये।

उन्होंने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर सत्ता परिवर्तन की बात कही। लेकिन अन्ना हजारे के सवाल तो सीधे प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश को भी यह कहते हुये कटघरे में खडा कर रहे हैं कि अगर यह जन लोकपाल के दायरे में नहीं आये तो भ्रष्टाचार करने के इन्हे ही मंच बना लिया जायेगा। यानी सरकार को जिस मंत्रालय में बड़ा घोटाला करना है वह मंत्रालय प्रधानमंत्री अपने पास रखेंगे। इसी तरह चीफ जस्टिस आफ इंडिया के फैसलों के जरिये सरकार अपनी सहूलियत के अनुसार कानून बनाने या कानून बिगाड़ने से नहीं हिचकेगी। क्या यह बात कहकर माओवादी इससे बच सकता है कि सरकार उसे राष्ट्रविरोधी ना करार दे।

जाहिर है माओवाद का मतलब हिंसा है। और अन्ना हजारे राजघाट पर बैठकर गांधी और भगत सिंह का ऐसा मिश्रण बना रहे हैं, जिसके घेरे में संसदीय राजनीति के शुद्धीकरण का सवाल उठेगा ही। और कानूनी तौर पर सरकार के सामने इन्हें रोकने के लिये आपातकाल सरीखा वातावरण बनाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता बचता नहीं है। जिसे सरकार ला नहीं सकती है। लेकिन, इन्हें रोक भी नहीं सकती है। तो क्या यह माना जा सकता है कि जिस मध्यवर्ग को माओवादी या अल्ट्रा-लेफ्ट शहरी बुर्जुआ कहकर खारिज करता रहा है, नयी परिस्थितियों में यही शहरी मध्यवर्ग अब सत्ता में अपने हक को उसी तरह खोज रहा है जैसे किसान, मजदूर, आदिवासियों के हक की बात नक्सलवादी से लेकर माओवादी करते रहे हैं। और किसी अल्ट्रा-लेफ्ट संगठन के महासचिव की जगह गांधी टोपी पहले अन्ना हजारे आंदोलन के एक नये प्रतीक बन गये हैं। जिससे टकराया कैसे जाये या संसदीय सत्ता किस तरह इन्हें खारिज करें यह रास्ता फिलहाल ना तो सरकार के पास है ना ही संसदीय राजनीति के पास।

लेकिन, 1948 के किसान आंदोलन से लेकर नक्सलबाड़ी होते हुये तेलागंना, बस्तर और नंदीग्राम में जो लकीर खिंची उसी सोच को राष्ट्रीय पटल पर सामूहिकता का बोध लिये सामाजिक आंदोलन की नयी जमीन पहली बार बदलने का संकेत भी दे रही है और बदलते संकेत में संसदीय सत्ता को भी चेता रही है कि कोई रास्ता उसने नहीं निकाला गया, तो देश में आंदोलन सत्ता की धारा बदल भी सकते है। यह संकेत अभी सांकेतिक हैं, लेकिन कल बदलाव की लकीर भी खिंच सकती है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।