Friday, 17 June 2011

क्यों कॉमर्स का कट ऑफ ज़्यादा होता है?


क्या  यह सही है कि कॉमर्स एक विधा नहीं है? एकेडमिक डिसिप्लिन। सांख्यिकी,अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों को मिला कर वाणिज्य विषय को गढ़ा गया है। इस पर आपके पास जानकारी हो तो ज़रूर शेयर करें लेकिन कुछ लोगों से बात करने पर यही पता चला कि बाहर के मुल्कों में भी ऑनर्स कोर्स में कॉमर्स नाम का विषय नहीं होता है। अगर यह जानकारी ग़लत पाई गई तो मैं अपने लेख में संशोधन कर लूंगा। बहरहाल इस बात पर विचार करना चाहिए कि कॉमर्स के लिए इतनी मारा मारी क्यों हैं?

दिल्ली विश्वविद्लाय में कॉमर्स में दाखिला लेने के लिए कामर्स विषय वालों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें सीट मिले इसलिए दूसरे विषय यानी साइंस से जब कोई बच्चा कॉमर्स में आता है तो उसे हतोत्साहित करने के लिए अधिक नंबर मांगे जाते हैं ताकि कॉमर्स वालों को पहले एडमिशन मिल जाए। इसी तरह से जब कॉमर्स के बच्चे दूसरे विषयों में दाखिला लेने जाते हैं तो उनके नंबर में दो से तीन परसेंट की कमी कर दी जाती है ताकि उन्हें इतिहास,गणित या अन्य विषयों में आने से रोक सकें। इसके पीछे सोच यही है कि कॉमर्स पढ़ने वालों की ट्रेनिंग अकादमिक नहीं होती। वे इतिहास या राजनीति शास्त्र में आकर अच्छा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें लंबे-लंबे लेख पढ़ने का अभ्यास नहीं होता। दिलचस्पी बनने में काफी वक्त लग जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ ही बच्चे कॉमर्स से इतिहास या समाजशास्त्र में आकर बेहतर कर पाते हैं। इसीलिए कॉमर्स कॉलेजों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे पहले अपने विषय के बच्चों का दाखिला करें। इसीलिए एसआरसीसी और एलएसआर में कटऑफ ज़्यादा होता है। कॉमर्स के अच्छे कॉलेज कम है और रोज़गारपरक बाज़ारू शिक्षा के नाम पर कम पढ़ने लिखने वाले छात्रों की तादाद ज्यादा। ऐसा विषय हो जो नौकरी भी दे और थोड़ा-थोड़ा सारे विषयों को पढ़ने का अवसर भी दे दे। कॉमर्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट और बैंकों की नौकरियों में कामर्स काफी उपयोगी विषय हो गया है।

अब रही बात कि इस साल सौ परसेंट वाला कट ऑफ क्यों गया? वो इसलिए कि सिब्बल साहब और वाइस चांसलर साहब दिल्ली विश्वविद्यालय को कबाड़ करने के अभियान में लगे हुए हैं। सेमेस्टर सिस्टम के अलावा इस बार दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव हुआ। पहले क्या होता था? पहले बच्चे फार्म भरते थे। हालांकि इसे लेकर कॉलेज दुकानदारी करने लगे थे। खैर फार्म भरने के बाद अमुक विभाग को अंदाज़ा हो जाता था कि पहले लिस्ट में कितने बच्चों को आने दिया जाए। इस बार यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। यह कहा गया कि जो भी कट ऑफ निकलेगा उसमें आने वाले सभी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा। अगर चालीस सीट है और कट ऑफ के बाद सौ बच्चे आ गए तो सौ के सौ को दाखिला देना होगा। अब यहां सुविधाओं और टीचर-छात्र के अनुपात का सवाल गया चूल्हे में। तो किसी भी कॉलेज को इस बार पहले से मालूम नहीं था कि अमुक विषय में कितने कट ऑफ वाले बच्चों ने अप्लाई किया है। इसलिए उन्होंने कट ऑफ को इतना ज्यादा कर दिया कि पहले लिस्ट में उन्हें अंदाज़ा हो सके। सिर्फ इसकी वजह से बच्चों को परेशानियां झेलनी पड़ गईं।

पढ़ाई माइग्रेशन का दूसरा बड़ा कारण है। देश भर के कॉलेज कबाड़ हो गए हैं। अगर नहीं भी हैं तो उन्हें अच्छे विद्यार्थी कबाड़ ही समझने लगे हैं। दिल्ली में पढ़ने के साथ प्रतिष्ठा का भी भाव जुड़ा होता है। राज्यों ज़िलों के कॉलेजों में कुछ अच्छे और प्रयत्नशील शिक्षकों को छोड़ दें तो बाकी सब राम भरोसे आते हैं और राम भरोसे चले जाते हैं। हम इस विषय को लेकर परेशान इसलिए नहीं होते कि फायदा नहीं। उससे पहले ट्रेन का टिकट कटा लेते हैं। मैं भी इसी सिस्टम के तहत रातों रात अपने कमरे से उजाड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। राज्यों के अच्छे कालेजों के कट ऑफ पता कर रहा था। कहीं भी सत्तर अस्सी फीसदी से ज्यादा नंबर नहीं जाता। उनके ख़राब कालेजों में औसत विद्यार्थियों की भरमार है। ९८ परसेंट वाले इन कॉलेजों को किसी लायक नहीं समझते। यह चिन्ताजनक हालात है। कपिल सिब्बल दिल्ली के दो कालेज के कट ऑफ पर बयान तो दे देते हैं मगर बाकी कालेजों के लिए वक्त नहीं। पता कीजिए देश का मानव संसाधन मंत्री पिछले कुछ सालों में कितने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दौरे पर गया है। उनके कामकाज की समीक्षा की है। वकील हो जाने से हर मुकदमे के जीत लेने की गारंटी नहीं मिल जाती। दलील बर्तन बजाने से नहीं बजती, उसके आधार भी होने चाहिएं।
--साभार कस्बा 

Tuesday, 7 June 2011

सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी

कांग्रेस ने चालाकी से भ्रष्टाचार के मुद्दे को धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक में बदल दिया है। रामदेव को मिठाई खिलाने से लेकर पिटाई तक के सफर में कांग्रेस अपनी कमज़ोरी को मर्दाना ताकत की दवाओं से दूर कर देने के लिए बेबस नज़र आई। दिल्ली आने से पहले रामदेव ने कहा था कि मुझे आरएसएस का समर्थन प्राप्त है। कभी नहीं कहा कि मैं आरएसएस से दूर हूं। रामदेव सरकार के दबाव में कहने लगे कि यह मंच राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक काम करने वाले संघ को सामाजिक बता कर कब एनजीओ में बदल दिया जाता है ये सब भगवा दल की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। साधु सियासत में रंग लगाने आते और भांग घोल कर चले जाते हैं। मंदिर मुद्दे पर लुट-पिट जाने के बाद सत्ता संघर्ष में वापसी के लिए बेचैन सन्यासी दल रामदेव को सहारा बना रहे थे। शनिवार को रामलीला मैदान में मंच से धार्मिक बयान दिये जा रहे थे। भारत महान की भगवा व्याख्या होने लगी। हरिद्वार के भारत माता मंदिर ट्रस्ट के किसी भगवा प्रमुख ने कहा कि वे महाभारत के किस्से तो पढ़ते हैं मगर आज सचमुच के महाभारत में शामिल होने आए हैं। कहीं से इन सबके दिमाग में है कि प्राचीन भारत की जड़ों में सन्यासियों का पसीना है। उनके आशीर्वाद और प्रताप से प्राचीन भारत विश्वविजेता था और अगर ये मिलकर एक मंच पर आ जायें तो भारत फिर से विश्वविजेता हो जाएगा। विश्वविजेता वाली अवधारणा ही कुंठित मनों की बुनियाद पर टिकी है।


रामदेव अगर सिर्फ योग के दम पर सर्वमान्य नेता बनने चले थे तो उन्हें संघ परिवार को लेकर अपनी नीति साफ करनी चाहिए थी। मंच से एक दो मुसलमानों को बुलवा देने से कोई सेकुलर नहीं हो जाता। बोलने के लिए तो एक जैन साधु भी बोल गए। मनोज तिवारी भी गाना गा गए। लेकिन इन सबसे से पहले रामदेव आरएसएस के समर्थन का बयान दे चुके थे। पूरे पंडाल में किसी हिन्दू महासभा का पोस्टर लगा था। आर्य वीर दल का पोस्टर लगा था। केसरिया पगड़ी धारण किये हुए लोग एक धर्म एक रंग का माहौल बना रहे थे। इससे पहले भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस के पोस्टर बैनर और नारों से सांप्रदायिक मन को राष्ट्रीय भावना वाला कवच पहनाने की कोशिशें होती रही हैं। यह सही है कि रामदेव ने कभी सांप्रदायिक बयान नहीं दिया। कम से कम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। मगर रामदेव ने स्टैंड क्यों नहीं लिया। वे अब क्यों कह रहे हैं कि उनका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं। फिर वे क्यों कहते हैं कि उनका आरएसएस से लेना देना है।

रामलीला मैदान में जब मैं बोल रहा था कि मंच पर धार्मिक प्रतीकों, मुहावरों और प्रसंगों के ज़रिये भारत की व्याख्या की जा रही है। मैंने लाइव प्रसारण में कहना शुरू कर दिया कि भ्रष्टाचार से हर मंच से लड़ा जाना चाहिए लेकिन क्या हमने आमसहमति बना ली है कि हम इस लड़ाई के साथ-साथ भारत की धार्मिक व्याख्या भी करेंगे। अगर ऐसा है तो क्या धर्म के भीतर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने की भी कोई पहल होगी? पास में खड़े एक सज्जन भड़क गए और कहने लगे कि धर्म को राष्ट्र से अलग नहीं किया जा सकता। ऐसी फालतू की दलीलें पहले भी सुन चुके हैं जब लोग राम मंदिर के नाम पर सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए जुगाड़ कर रहे थे और जनता को गुमराह कर रहे थे। अगर यह दलील इतनी ही शाश्वत है तो फिर नितिन गडकरी क्यों कहते हैं कि राममंदिर बीजेपी का मुद्दा नहीं है। तो किसका था और किसका है। रथ लेकर किसके नेता निकले थे? इसीलिए धर्म से राष्ट्र की व्याख्या नहीं कर सकते। कब कौन किस पुराण की दलील देकर किधर से निकल ले पता नहीं चलता। प्रवेश करने और निकलने का मार्ग खुला रहता है। सरस्वती शिशु मंदिर और गुरुकुल की लड़कियों से हिन्दू राष्ट्र गान गवा कर किसी आंदोलन को आप गैर राजनीतिक नहीं बता सकते। पंडाल में मौजूद कई लोग जो संघ से जुड़े या समर्थन रखते हैं, दूसरे संगठन में काम करते हैं, दिल्ली आई भीड़ के ज़रिये किसी धर्म राष्ट्र का सपना तो देख ही रहे थे।

रही बात सरकार की तो वो अपने अहंकार में इतनी मदमस्त रही कि पहले दिन से लेकर आखिर दिन तक टेटिया ज़बान में बात करती रही। अण्णा हज़ारे के आंदोलन को फर्जी सीडी के ज़रिये ध्वस्त करने की कोशिश की गई। जब एक्सपोज़ हो गई तो लगी कमेटी से गंभीर बात करने। लेकिन इस बार सतर्क थी। रामदेव नहीं थे। सरकार ने रामदेव को फंसा लिया। चिट्ठी लिखवा ली। जिस तरह से चिट्ठी दिखाई जा रही थी उससे बाबा तो एक्सपोज हो ही रहे थे सरकार भी हो रही थी। रामदेव को अपनी ताकत दिखाने के बजाए अण्णा हज़ारे के साथ चलना चाहिए था। संघ और हिन्दू महासभा के लोगों को मंच पर बुलाकर मंच को राजनीतिक नहीं बनाना चाहिए था। बीजेपी भी गैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव कर रही थी. अपने प्रोग्राम में जब मैंने राजीव प्रताप रूडी से पूछा कि क्या आप रामदेव के सभी मांगों का समर्थन देते हैं तो सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने पूछा कि क्या पांच सौ के नोट खत्म करने और हिन्दी मीडियम शुरू करने की मांग पार्टी की है तो जवाब नहीं दिया। कहा कि पहले भ्रष्टाचार पर तय हो जाए उसके बाद देखेंगे।अब बीजेपी सत्याग्रह कर रही है कि रामदेव पर अत्याचार क्यों हुआ? फिर से जलियांवालां बाग और आपातकाल की यादें आने लगीं। किसी भी सूरत में इसकी तुलना जलियांवालां बाग से नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कि कांग्रेस ने लाठी चलवा कर बड़ी ग़लती की है। इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। वो सिर्फ अपनी सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन करना चाह रही थी। पांच हज़ार पुलिस लेकर कूदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। तब फिर राहुल गांधी कहां जाकर आंदोलन करेंगे और भट्टा परसौल की तरह मायावती की आलोचना करेंगे कि गांव के लोगों को पुलिस ने पीटा।

रामदेव का अपना मार्केट है। वे मार्केट में खेलने वाले सन्यासी रहे हैं। कई लोग मंच पर ही ग्यारह और बारह लाख का चंदा देने लगे। रांची के राम अग्रवाल ने तो ग्यारह लाख का चेक थमा दिया। दिल्ली के अशोक विहार की सभा में पचास लाख रुपये जमा होने की ख़बर थी। संसाधनों की कोई कमी नहीं रामदेव के पास। भ्रष्टाचार से लड़ने की नीयत पर भी सवाल नहीं खड़े किये जा सकते। मगर समर्थन,साधन और तरीके को लेकर बहस तो हो सकती है। शायद इसी वजह से रामदेव का आंदोलन सर्वमान्य सर्वधर्म नहीं बन सका। रामदेव के सलाहकार ग़लत थे। अब वे अपनी लड़ाई छोड़ आरएसएस और बीजेपी पर सफाई देते फिरेंगे। उन्हें तय करना होगा कि भारत को वैकल्पिक रूप से समृद्ध और खुशहाल करने का रास्ता बचे-खुचे हिन्दू संगठनों से ही जाएगा या कोई दूसरा तरीका भी है। कई बार लगता है कि वे रामलीला मैदान के पंडाल के मोह में फंस गए। जब डील हो ही गई थी तो वापस चले जाना चाहिए था। किसी व्यापारी का ही तो पैसा लगा था,उसे पुण्य तो तभी मिल गया था जब उसने बैंक से पैसे निकाल कर बाबा को दे दिये थे। उसके दुख की क्या चिन्ता।

ज़ाहिर है रामदेव और सरकार दोनों एक दूसरे से खेल रहे थे। लड़ नहीं रहे थे। इस खेल-खेल में कुछ भयंकर किस्म की ग़लतियां हो गईं। यह सरकार अब पब्लिक पर ही ताकत दिखाएगी। लाखों करोड़ों लूट कर चले गए लोगों में से दो चार को जेल भेज कर सत्याग्रही बन रही है। सवाल दो बड़े हैं। क्या किसी सही मुद्दे से लड़ने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लिया सकता है और दूसरा क्या सेकुलर बने रहने के लिए किसी सरकार को अहंकारी और घोटालेबाज़ बने रहने दिया जा सकता है? बहरहाल फिर से सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी शुरू हो गया है।

नोट- वैसे सलवार कमीज़ और दुपट्टे में रामदेव सुसंस्कृत,सुशील,सौम्य और घरेलु लग रहे हैं। यह तस्वीर दुर्लभ है। प्राण देने वाले बाबा ने प्राण बचाने के लिए स्त्री धर्म का जो सम्मान किया है उसका मैं कायल हो गया हूं। हज़ारों की भीड़ ने बाबा को बचाने की कोशिश नहीं की, लड़कियों के छोटे से समूह ने यह जोखिम उठाया। उनका सम्मान किया जाना चाहिए।
sabhar -ravish kumar

Saturday, 4 June 2011

किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक


खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए। इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं। दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए।

इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है। आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर( अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।

दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है।

मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए।

भाई साहब,किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।
साभार -रविश कुमार 

Friday, 3 June 2011

शंका में संघ

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कही गुम हो गया है। क्या संघ परिवार के भीतर आतंकवादी हिंसा के दाग का दर्द है। क्या आरएसएस अयोध्या पर जा रुके हिन्दुत्व को नये तरीके से परिभाषित करना चाहता है। क्या स्‍वयंसेवक अब भाजपा के पीछे चलने को तैयार नहीं है। क्या संघ कोई नयी व्यूह रचना में लगा है। चाहे यह सारे सवाल हों, लेकिन संघ परिवार के भीतर यही सवाल ऑक्सीजन का काम कर रहे हैं। क्‍योंकि पहली बार आरएसएस यह मान रहा है कि बिछी हुई बिसात में ना तो भाजपा सियासी फन काढ़ सकती है और ना ही संघ सामाजिक तौर पर अपनी ताकत बढ़ा सकता है। और अगर वह फेल है तो पास होने के लिये उसे नये सिरे से नयी परिस्थितियां खड़ी करनी होंगी। इस सवाल ने संघ ने कुछ ऐसे निर्णयों पर सोचने का मन भी बनाया है जिन पर अभी तक रास्ता निकालने की जद्दोजहद ही समायी रहती थी। यानी जहां फेल हो रहे हैं उसके कारण खोजे जायें। उन्हें ठीक किया जाये। क्‍योंकि अखिरकार सभी को साथ लेकर ही तो चलना है। यह सोच पहली बार बदल रही है। राजनीति का रास्ता भाजपा तभी तय करती जब आरएसएस सामाजिक लकीर खींच देता है। लेकिन, संघ लकीर ना खींचे तो पाकिस्तान से लेकर महंगाई तक और किसान से लेकर भ्रष्‍टाचार तक के मुद्दों पर भाजपा कहीं नजर नहीं आती है। ऐसे में राजनीति में हाथ जलाये बगैर कौन सा प्रयोग संघ को सामाजिक तौर पर मान्यता दिलाते हुये सियासत पलट सकता है।

1974 के बाद पहली बार संघ में इस बात पर कुलबुलाहट शुरू हुई है। पहली सहमति है कि तरीका सियासी या भाजपा के कांधे पर सवार होकर नहीं चलेगा। दूसरी सहमति है कि संघ परिवार के सभी संगठन अपने अपने दायरे को बड़ा करते हुये अगर आदिवासी, किसान, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, लघु उघोग से लेकर छात्र और मजदूरों के सवालों को ही उंठाये, तो नयी बिसात बिछाने में कोई परेशानी हो नही सकती। यानी किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ, लघु उद्योग भारती समेत चालीस से ज्यादा क्षेत्रों में कार्यरत संघ के स्वयंसेवक बीते सात बरस में रुक गये हैं। सात बरस पहले संघ साप्तहिक या मासिक तौर पर देश भर में 5827 स्थानो पर बैठक किया करता था। लेकिन, उसके बाद से यह घटते-घटते तीन हजार तक आ पहुंचा। वहीं 2004 तक यानी भाजपा की सत्ता रहते हुये भी सत्ता भोग रहे स्वयंसेवक भी विभिन्न संगठनों में शिरकत किया करते थे। लेकिन सत्ता गंवाने के बाद भाजपा और आरएसएस के बीच के तार सिर्फ राजनीतिक मुद्दों को लेकर ही जुड़े। धीरे-धीरे यह संबंध ऐसे बेअसर हो चुके हैं कि संघ की किसी भी पाठशाला में भाजपा नेताओं की मौजूदगी संघियों में गुस्सा पैदा करती है और भाजपा भी संघ को अयोध्या के घेरे से बाहर देख नहीं पाती। इसलिये भाजपा की राजनीतिक बैठकों में संघ के स्वयंसेवकों की मौजूदगी दिल्ली के माडरेट राजनेताओं को दूर कर देती है। इसका पहला असर तो यही हुआ है कि आरएसएस संघ मंडलियां घटकर 5629 तक आ पहुंची हैं, जो 2003 में 7037 हुआ करती थीं। हालांकि देश के भीतर के हालातों ने संघ के महत्व को भी बढ़ाया है और 2700 से ज्यादा प्रचारकों में से करीब साढे पांच सौ प्रचारक जो अलग-अलग संगठनों में लगे हैं उनके काम बढ़े हैं। आम-आदमी से जुड़े जो मुद्दे प्रचारकों की बैठको में उठते हैं उसमें पहली बार यह सवाल भी उठे हैं कि राजनीतिक तौर पर जब भाजपा इन सवालो का सामना करने को तैयार नहीं है या फिर भाजपा सफल नहीं हो पा रही है, तो संघ को भाजपा के पीछे क्यों खड़े होना चाहिये।

भ्रष्‍टाचार और महंगाई का सवाल भाजपा ने ना सिर्फ उठाया बल्कि उसकी राजनीतिक शुरुआत असम से की। और असम के चुनाव में संघ परिवार भी भाजपा के पीछे खड़ा हुआ। यहां तक कि संघ की शाखायें भी राजनीतिक तौर पर असम में मुद्दों पर चर्चा करने लगीं। लेकिन, भाजपा का हाथ खाली ही रहा। और इस चुनावी हार ने आरएसएस के उत्तर-पूर्वी राज्यों के बोडोलैण्ड से लेकर बांग्लादेशी जैसे मुद्दों को भी सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। यानी संघ के भीतर नया सवाल यह भी है कि जिन सामाजिक मुद्दों पर संघ ने अपनी पहचान बनायी और जिन मुद्दों पर भाजपा की सियासत में सामाजिक सरोकार के टांके लगे वही सुनहरे टांके अब संघ परिवार को भाजपा की वजह से चुभ रहे हैं। ऐसे ही सवाल किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच के दायरे में भी हैं। इसलिये आरएसएस अब खुद को मथने के लिये तैयार हो रहा है। और मथने के इस दौर में मुद्दों के आसरे जिन स्थितियों को संघ बनाने में जुटा है उसमें सामाजिक-राजनीतिक का ऐसा घोल भी घुल रहा है जो भाजपा के विकल्प की दिशा में बढता कदम भी हो सकता है। अन्ना हजारे के मंच पर संघ की पहल। बाबा रामदेव के साथ खडे गोविन्दाचार्य की अनदेखी कर रामदेव के उठाये मुद्दों पर स्‍वयंसेवकों को साथ खडा करने की सोच। स्पेक्ट्रम घोटाले के खिलाफ खडे सु्ब्रहमण्यम स्वामी के जरिये संघ के सवालों को धार देने का प्रयास। किसानों की त्रासदी को बिगड़ी अर्थवयवस्था से जोड़ने का प्रयास और महंगाई को समाज में बढ़ती असमानता के अक्स में देखने और दिखाने की जद्दोजेहद।

और इन सारे प्रयासों में आरएसएस कभी भी भाजपा के नेताओं या उनकी राजनीतिक शिरकत के साथ नहीं रही। तो क्या संघ राजनीतिक तौर पर भाजपा की वर्तमान जरुरतों को दूसरे आंदोलन वाले चेहरो के आसरे पूरा कर रही है। या फिर पहले आरएसएस की पारंपरिक परिभाषा को नये कलेवर में रखना चाह रही है। क्‍योंकि एक तरफ सुब्रहमण्यम स्वामी संकेत देते हैं कि हिन्दुत्व की नयी परिभाषा संघ को गढनी होगी। और सोनिया गांधी का जवाब अब भाजपा के पास नहीं है और अयोध्या में ठिठका हिन्दुत्व भी सोनिया के सेक्यूलरवाद में सेंध नहीं लगा सकता। वहीं स्वदेशी जागरण मंच से गुरुमूर्त्ति संकेत देते है कि मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था के भ्रष्‍टाचार से भाजपा इसलिये नहीं लड़ सकती क्‍योंकि उसके पास न तो वैकल्पिक इकनॉमी का कोई मॉडल है और ना ही वह खुद भ्रष्‍टाचार से मुक्त है। जबकि आरएसएस को स्वदेशी मॉडल को बदलना होगा। यही सवाल मजदूर संघ को लेकर भी हैं। क्‍योंकि मनमोहन सिंह की अर्थवयवस्था में जब ट्रेड यूनियन ही मायने नही रख पा रही है और बाजार अर्थव्यवस्था पर नकेल कसने का सवाल खडा करने वाली वाम सत्ता को भी जब जनता ने ध्वस्त कर दिया तो फिर आरएसएस की संख्या किसी भी राजनीति पार्टी को कितना लाभ पहुंचा सकती है। अब यह भाजपा भी जान रही है और संघ भी। इसलिये संघ के सामने नया सवाल यही है कि संघ के मुद्दे जब तक राजनीति के केन्द्र में ना आयेंगे तबक आरएसएस के सवाल भाजपा के पीछे ही चलेगे और भाजपा कांग्रेस की कार्बन कापी ही नजर आयेगी। इसलिये आरएसएस के भीतर नयी वैचारिक उठा-पटक उन मुद्दों के आसरे अपने संगठनो को खड़ा कर राजनीति की धारा को अपने अनुकूल करने की ही है।

संघ समझ रहा है कि राजनीतिक तौर पर 1974 की तर्ज पर जेपी का कोई राजनीतिक प्रयोग तो संभव नहीं है, लेकिन बाबा रामदेव के आसरे ही सही अगर संघ को जगाया जा सकता है और सरकार को चेताया जा सकता है तो 2014 तक भाजपा के बदले एक नया राजनीतिक संगठन भी खड़ा किया जा सकता है, जो राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता पाये और विकल्प भी बने। क्‍योंकि मनमोहन सरकार से आम आदमी को मोह भंग हो चुका है, लेकिन काग्रेस का विकल्प भाजपा हो इसे लोग स्वीकारने की स्थिति में नहीं हैं। और संघ अब भाजपा को शह देने की स्थिति में भी नहीं है। नयी परिस्तितियों में रामदेव हों या अन्ना हजारे, हर किसी को आंदोलन के लिये जो संगठन चाहिये वह सिर्फ आरएसएस के पास है, और नयी परिस्थितियां पहली बार संघ को उसी दिशा में ले जा रही है जहां रेड्डी बंधुओ पर आपस में भिड़ी भाजपा को दफन किया जा सके और संघ ही एक वैकल्पिक सोच का आईना बने । जहां भविष्य में संघ में किसी मुद्दे को लेकर अयोध्या की तर्ज पर ठहराव ना हो। और नयी पीढी यानी युवा तबका संघ को पारंपरिक ना मान कर भारतीय सामाजिक परिस्थितियों को वैज्ञानिक तरीके से अपने अनुकुल पाये, और संघ की पहल इसी सोच को जोड़ते हुये उन खतरों को उठाते चले जो देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगाये हुये हैं। पहला प्रयोग बाबा रामदेव से शुरू होना है इसलिये इंतजार कीजिये। क्‍योंकि संघ का नया रास्ता इससे भी तय होगा लेकिन संघ जीते या हारे दोनों स्थितियों में भाजपा खतरे में है यह तो तय है                                                                                                                                                                                            साभार -पुण्य प्रसून बाजपेयी

Wednesday, 1 June 2011

पत्रकारिता का विचार-वाचन काल

दसवीं की हिन्दी की किताब में किसी मशहूर लेख का हिस्सा था। तुलसी के बारे में किसी महान लेखक ने लिखा था शायद। खैर यह संदर्भ ग़लत भी हो तो कोई बात नहीं। मैं पहली पंक्ति यानी प्रमेय का इतना सा मतलब समझता हूं कि एक व्यक्ति में जीवन के तमाम पहलुओं को विचारने और बोलने की क्षमता आ जाए तो वो ऐसे प्रमेयों पर खरा उतरता है। टीवी ने एक ऐसा चैट ब्रिगेड पैदा कर दिया है जो दस मिनट में किसी भी बहुमुखी समस्या पर एकमुखी जवाब देने में माहिर हैं। हबर-हबर सवालों को ठेल-ठेल कर अपने जवाबों के लिए स्पेस बना लेते हैं। वो आते हैं। आते-जाते रहते हैं। कई बार समस्याओं की ऐसी परत खोल जाते हैं जो वायुमंडल में अनियंत्रित विचरित करने लगते हैं। टीवी तो ब्रेक लेकर लौट चुका होता है मगर सुनने वालों के कानों से मस्तिष्क तक की यात्रा में उनके विचार कैसे-कैसे रूप धरते होंगे मालूम नहीं।

टीवी पर चैट ब्रिगेड अब एक हकीकत है। टीवी के उदय के साथ ही आया। अख़बारों में तो इस चैट ब्रिगेड के हवाले पांच एकड़ का संपादकीय पन्ना कर दिया जाता रहा है। जिनमें हम सभी अपना कूड़ा और सोना एक साथ उगलते रहते हैं। जनमत निर्माण की प्रक्रिया में। सरकार,सेना,विश्वविद्यालय से रिटायर हुए इन चैट गुरुओं के दम पर टीवी का काम चलेगा। पत्रकारों को अब ऐसा मौका नहीं मिलेगा कि वो मौके पर जाने के अपने अनुभवों का सार दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर सकेंगे। इसलिए अब इन चैट गुरुओं के विशाल अनुभवों का लाभ उठाया जाने लगा है। टाइम्स नाउ ने इसे औपचारिक और सांस्थानिक रूप दे दिया है। दो घंटे तक दर्शकों का कौन वर्ग एक या दो मुद्दे पर लगातार अलग-अलग विचार वाचन सुन रहा है मालूम नहीं। सुन ही रहा होगा तभी हर तरफ उसकी अनुकृति दिखाई देती है। टाइम्स नाउ से पहले जब एनडीटीवी ने न्यूज़ आवर, बिग फाइट,मुकाबला और वी द पिपुल की शुरूआत की थी तब ऐसे शो सप्ताहांत में ठेले जाते थे। सीधी-बीत,कशमकश,मुद्दा, ज़िंदगी लाइव,सलाम ज़िंदगी,वर्सेस,अस्मिता जैसे कई शो अस्तित्व में आए। आप की अदालत ने तो पायनियर का काम किया है।

माना जाता था कि छुट्टी के दिन दर्शक विचार-वाचन सुनना पसंद करेगा। इन शो के लिए विचार वाचक खोजे गए। कई लोग इस आधार पर रिजेक्ट किए गए,जो जानकारी तो बहुत रखते थे मगर बोलने की शुरूआत पृष्ठभूमि और संदर्भ से करने लगते थे। हर सवाल का जवाब उस मुद्दे पर लिखी गई सारी किताबों का सार प्रस्तुत कर देने लगते थे। इसी ट्रायल एंड एरर में कई लोगों ने बाज़ी मार ली। उन्होंने खुद को ज़रूरतों के हिसाब से ढाल लिया। वो सवाल कोई सा हो मगर अपना जवाब तीस सेकेंड में वायुमंडल में ठेल देते हैं तो तरंगों पर सवार होकर आपके कानों तक पहुंचने लगा। बहुत से विचार-वाचक एंकर के मुकाबिल स्टार हो गए। उनकी पूछ इतनी बढ़ गई कि एक आदमी के पीछे पांच-पांच चैनल के गेस्ट रिलेशन के लोग पैदा हो गए। हर चैनल में गेस्ट रिलेशन संपादकीय टीम का हिस्सा हो गया। नेता,विचार-वाचक अब इस गेस्ट रिलेशन के लोगों के संपर्क में आ गए। पत्रकारों की जगह इन लोगों ने ले ली। जो जानकारी एक पत्रकार को होनी चाहिए कि किस विषय पर कौन कैसा बोलता है वो अब गेस्ट रिलेशन के लोग जानते हैं। इसीलिए इन्हें अब पत्रकार और संपादकीय टीम का हिस्सा मानना ही होगा। ख़बरों की भनक भी कई मामलों में इन्हें पत्रकारों से पहले लग जाती है। पर अभी इन्हें वो संपादकीय सम्मान नहीं मिला है।

ख़ैर,टाइम्स नाउ ने न्यूज़ आवर की परंपरा को आगे बढ़ाया। अब हर चैनल में विचार वाचन तुरंत होने लगा है। उसी दिन और उसी शाम। विचार-वाचन पत्रकारिता अब वीकेंड नहीं रही। डेली हो गई। जिस दर्शक के बारे में कहा जाता है कि समय नहीं है उसके पास ठहर कर ख़बर देखने-सुनने की इसलिए स्पीड न्यूज़ दो वही दर्शक ठहर-ठहर कर विचार सुन रहा है। वो भी रोज़। अब कोई तो बताये कि दर्शकों के पास कहां से घंटों विचार सुनने का वक्त पैदा हो गया है। हिन्दी-अंग्रेजी कोई सा भी चैनल हो किसी न किसी पर कोई न कोई गेस्ट होता ही है। विचार-वाचकों का न्यूज़ रूप में औपचारिक नाम गेस्ट होता है। जिसे एंकर लाइव होते ही जानकार बताता है। मुझे विचार-वाचक तुलसी की तरह लगते हैं। इन्हें जीवन का हर दर्शन मालूम होता है। ये हर सवाल का मुकम्मल जवाब दे सकते हैं। अखबारों में भी नए-नए विचार वाचक ढूंढे जा रहे हैं। वहां भी टीवी की प्रक्रिया का असर हो रहा है। वहां भी जानने वाले की जगह पहचाने जाने वाले को ढूंढा जा रहा है। जो फेस है वही रेस में है। जो फेस नहीं है वो आउट। विचार का संबंध जानकारी से कम पहचान से ज्यादा हो रहा है।

पाकिस्तान को लेकर ही सारी थ्योरी अपनी जगह पर स्थिर है। मगर विचार-वाचक आकर उसे प्लावित कर देते हैं। किसी भी बहस में पाकिस्तान को लेकर उम्मीद पैदा नहीं की जाती। उसके आवाम की कोई तस्वीर नहीं बनती। सिर्फ धांय-धांय बात-बम फेंका जाता रहा है। कितने साल से कहा जाता रहा है कि पाकिस्तान नाकाम और नापाक हो चुका है। मगर पाकिस्तान तो अपनी जगह पर कायम है। चुनौतियां किस मुल्क के इतिहास में नहीं आतीं। बात और है कि पाकिस्तान की यह रात थोड़ी लंबी हो गई है। पाकिस्तान को लेकर होने वाली हर बहस में भारत को जीतना ही क्यों ज़रूरी होता है। सियासी प्रवक्ता तो हर सवाल पर एक ही बात करते हैं। इनका-उनका चलता रहता है। उनकी बातों को ध्यान से सुनें तो कोई नतीजा नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि बिना साइलेंसर वाली बाइक भड़भड़ाते हुए मोहल्ले से गुज़र गई। जब तक आपने खिड़की खोली कि हुआ क्या है तब तक न धुआं बचता है न शोर। सियासी प्रवक्ता शाम को टीवी पर आने में माहिर हो गए हैं। इनमें शरद यादव जैसे माहिर नेता भी हैं। साफ मना कर देते हैं। कहते हैं सियासी बातें ऐसे नहीं होती हैं। लेकिन बाकी लोगों को तो पार्टी की तरफ से काम दिया गया है कि टीवी में बोलना है। उनकी बात को काटने का प्रमाण तो होता नहीं। सिर्फ एंकर के भयंकर और नवीनतम सवाल होते हैं। लगता है कि बम ही छोड़ दिया लेकिन छुरछुराने के बाद कोई धमाका नहीं होता। क्योंकि कई जगहों पर अब रिपोर्टर ख़बर नहीं,गेस्ट लाने लगा है।

आप देखते रहिए माफ कीजिएगा सुनते रहिए टीवी।पर एक बात है अच्छा बोलने वाला मिले, धज और धमक से तो बहस में वाकई मज़ा आ जाता है। नई दलील आ जाए,नई बात आ जाए तब। कई बार यही गेस्ट रिपोर्ट की अधूरी ख़बर को अपनी जानकारियों से पूरी भी कर देते हैं। यह शुक्ल पक्ष है। बहरहाल,विचार-वाचन पत्रकारिता का औपचारिक स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि ये मौजूद तो टीवी के आने के समय से ही है। टीवी दिखाने की जगह बोलने की चीज़ हो गया है। लोकसभा टीवी से लेकर तमाम टीवी में लंबी-लंबी चर्चाएं हो रही हैं। अमर्त्य सेन ने ठीक ही कहा है कि हम बातुनी इंडियन हैं। हर जगह वही लोग बोल रहे हैं। वही लोग सुन रहे हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा बोल रहे हैं। कुछ लोग वही बात बार-बार अच्छा बोल रहे हैं। जो बोलता है वो दिखता है। नया फार्मूला। वैसे है पुराना। नया कहने से थोड़ा कापीराइट का क्लेम आ जाता है।

            - साभार कस्बा  

Friday, 27 May 2011

स्वर हीनता के दौर में किसानी


                    

      

   -के.बाबला 
भारत की 2020 में वैश्विक स्थिति क्या होगी इस पर लगातार प्रधानमंत्री से लेकर विद्यालयों के प्राचार्य अपना मत प्रकट करते इन दिनों मिल जाएंगे। पर इस सबसे बड़े लोकतन्त्र में, सबसे बड़ी आबादी वाले कृषक समाज की ख़ोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं दिखता। जब प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रारूप को विनोवा भावे के सामने ले जाया गया तो उन्होने पूछा था इसमें किसान कहाँ है? अगर वर्ष 2011-12 के बजट के समय तक विनोवा ज़िंदा रहते तो निश्चित रूप से उनका प्रश्न कुछ इस तरह का होता- क्या इस देश में अब किसान नहीं रहते हैं? वर्तमान बजट के कुल हिस्से में मात्र 2% खेती-किसानी के लिए रखा गया है। आर्थिक उदारीकरण ने जहां किसानों कि कमर तोड़ दी वहीं सरकारी उदासिनता से ग्रस्त किसान अब लाचार हो गए हैं आत्महतयाएं करने को। पर क्या आत्महत्या उसी समय मानी जाएगी जब अपनी इह लीला समाप्त करने वाला किसान सरकारी तौर पर कर्ज़ में डूबा हो? क्या उसी किसान को खुद को मारने वाला कहा जाएगा जिसमें ऐसा करने की इच्छा थी और क्या आत्महत्या जानबूझकर स्वयं को मारना है? कोई भी किसान आत्महत्या एकदम तात्कालिक कारणों से नहीं करता बल्कि उसके निर्णय के पीछे पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दवाब काम करते हैं। विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा आत्महत्याओं के कारणों की अनेक प्रकार से व्याख्या की गयी है। सरकार ने इन आत्महत्याओं का कारण मुख्यत फसल बिगड़ जाने को माना है। आत्महत्याओं से निपटने के लिए सरकार दो तरीके से काम करती है। अव्वल पैकेज की घोषणा कर दूसरा दोयम किसानों को मनोवैज्ञानिक मदद देने के लिए आत्मविश्वास जागृति अभियान के तहत भजन-कीर्तन करा कर। दुर्भाग्य से इन सभी उपायों ने देश में छोटे-बड़े 85% किसानों के व्यवस्थातमक प्रकृति को नज़र अंदाज़ किया गया है। किसान नेता विजय जावधिया के आनुसार- जिस संकट ने किसनों को आत्महत्याएँ करने को मजबूर किया है उसके मुख्य दो कारण है। लागत बढ़ने से आर्थिक तंगी और देश के बाज़ारों को दुनिया के लिए खोलने के कारण फसलों की कीमतों में उतार चढ़ाव है।
किसान के लिए आवाज़ उठाने वालों की संख्या नाम मात्र की रह गई है बौद्धिक वर्ग, समाजसेवी और नेता किसानी की समस्या को चूल्हा समझ पनी रोटियाँ सेंकने में लगे हैं। जो भी आंदोलन हुए वे किसानों के लिए नहीं बल्कि भूमिहीन मज़दूरों के लिए, किसान मज़दूरों के लिए हुए। जिसमें हमेशा ही किसान शोषक ठहराकर उसको दुर्लक्षित किया गया। उसकी समस्याओं को लेकर कभी कोई आंदोलन हुआ ही नहीं। गत 60 सालों में किसानों का यह लोकतन्त्र किसानों के लिए कोई ठोस योजना बनाने में नाकामयाब रहा है। मार्क्सवादी विचारधारा में कहा गया था कि किसान मजदूरों का शोषण कर पूंजी का निर्माण करते है, लेकिन आज किसानी के रॉ माटेरियल के शोषण से पूंजी का निर्माण हो रहा है। कृषि आंदोलनों के दौर में एक मात्र शरद जोशी जी ने यह बात राष्ट्र के सामने राखी थी।
आत्महत्या एक प्रक्रिया है जो सालों से किसानों की अनदेखी के करणों का परिणाम है। किसान आत्महत्या को समझने के लिए किसानों के परिवेश को समझना जरूरी है। भूमंडलीकरण से पहले महराष्ट्र के किसान आनज उपजाने पर ध्यान देता था तथा पूरक के तौर पर किसान के पास पशुपालन थी। जिसके चारे की पूर्ति फसल के सह-उत्पाद से ही हो जाता था, यदि फसल खराब भी होती थी तो किसान पशुपालन से अपना जीविकोपार्जन कर लेता था। फिर 1991 में भूमंडलीकरण का दौर आने के साथ किसान को मार्केट नीति के अनुसार कैश क्राप उपजाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाने लगा। आनज की खेती कम हो गई। पशुपालन खुद ब खुद किसान से दूर होता चला गया। भूमंडलीकरण आपने साथ वर्चस्व का बाज़ार, लाभ आधारित संबंधों पर बनी एकल संस्कृति लेकर आता है। यही वो समय था जब युवा किसान खेती छोड़ शहर का रुख कर रहे थे। गावों में खेती के लिए ज़मीन तो थी पर लोगों का शहर की ओर पालयन जारी रहा। खेती मजदूरों के आसरे होने लगी। अब भूमंडलीकरण का असर खेती पर भी दिखने लगा था मजदूरी दर बढ़ चुकी थी लेकिन आनज और सस्ता होता जा रहा था।
खेती तो हमेशा से ही किसानों के लिए जुआ ही रही है पर नकदी फसल के प्रचलन ने इसके रिस्क फैक्टर को और बढ़ा दिया। कृषि संसाधन सही हो तभी अच्छी फसल की उम्मीद कर सकते हैं। हानिकारक उर्वरक, कीटनाशक से खेत की उपजाऊ शक्ति कम हो जाते हैं। किसान को अब हर बार उर्वरक, कीटनाशक के लिए किसान को बाज़ार का रुख करने की जरूरत होती है। इन सब के बीच अगर फसल अच्छी नहीं हुई तो किसान के पास जमा पूंजी के आलवा और कुछ नहीं होता। फिर त्यौहार, बेटी की शादी के लिए पैसे की जरूरत ने किसानों को साहूकारों की चोखठ पहुचा देता है। कर्ज़ के बोझ के तले दबे हताश, निराश, किसान नशे को अपनाता है। अंत में परिस्थितियों से हारकर किसान अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है।             
 सरकारी योजनाओं की खबर लें तो ये भरी भरकम आंकड़ों के साथ हमारे सामने उपस्थित होते हैं। आत्महत्या की बढ़ती प्रवृति को रोकने के लिए सरकार ने वर्ष 2008-09 के लिए लगभग चार करोड़ किसानों के कर्ज़ माफ करने हेतु साठ हज़ार करोड़ का प्रावधान किया ताकि किसानों की खेती के प्रति रुझान बनी रहे। नेशनल सीड प्रोटेक्षण मिशन के तहत भी किसानों को बीज़, मशीन, संसाधन, नये तकनीक, प्रशिक्षण आदि की उपलब्धता प्रदान करने की कोशिश की गई है। इस मिशन पर 11वी पंचवर्षीय योजना (2007-11) के दौरान कुल परिव्यय 488.25 करोड़ का रखा गया है। इस योजना के तहत 17 प्रदेशों के 312 ज़िलों में लागू की जा रही है।
किसान को कभी से इन भारी भरकम आकड़ों से मतलब नहीं होता बल्कि धूप में अपने बदन जलाने वाला किसान खुद के दो जून की रोटी चाहता है। किसान समर्थित तमाम योजनाओं के बावजूद देश का पेट भरने वाला किसान भूखा, नंगा, अपने खेत में अपनी कब्र देखता है। जब अनाज के दाम बढ़ते हैं तब सरकार हस्तक्षेप करती है और निर्यात पर पाबंदी लगती है। जिसका नुकसान किसानों को झेलना पड़ता है। लेकिन जब दाम गिर जाते हैं तब सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करती।
किसानी के लिए किसान के पास सबसे बड़ा आसरा उसके पास अपनी ज़मीन का होना है। जब यही ज़मीन उससे छिन जाती है तो किसान की हिम्मत जबाब देने लगता है खेती उसके लिए कठिन ही नहीं अभिशाप भी हो जाती है। हमने देखा है कि हाल के कुछ वर्षों में सरकारों ने किसानों की ज़मीनों से कोई मोह नहीं दिखाया है। उसे लगातार पूँजीपतियों को सौंपा जा रहा है। इस प्रक्रिया ने किसानी की ताबूत में आखरी कील का काम किया है।  
दूसरे शब्दों में, जब किसान के पास न तो स्थिर पूंजी (ज़मीन) और न ही कार्यकारी पूंजी (बीज,खाद आदि) रह जाते हैं। तब उसके पास आत्महत्या करने के अलावा और क्या चारा रह जाता है? सर्वेक्षणों में पाया गया है कि कार्यकारी पूंजी आत्महत्याओं के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इस तरह के करणों से 1997 से लेकर आज तक बीस लाख से अधिक किसानों ने मौत को गले लगाया है ।
दरअसल यह दुखद है कि आज भी इस देश के आखरी आदमी तक राशन की दुकान ही नहीं पहुँच पाई है। सरकारी उदासिनता और गलत नीतियों के कारण आज एक समाज जिसने वर्षों से पूरे सभ्य समाज के भोजन संबंधी ज़िम्मेदारी को अपने सर-माथे पर लिया है, ज़िंदा रहने के लिए अपने सामाजिक वातावरण से समझौता कर मजदूर बनने को मजबूर है। क्या हम कल्पना कर सकते हैं एक कृषक विहीन समाज की? एक ऐसा समाज जहां कोई किसान नहीं होगा?

2जून 2011 D.N.A LUCKNOW संस्करण में प्रकाशित


Sunday, 22 May 2011

बदला नहीं बदलाव की राजनीति

-के बाबला
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को माँ माटी मानुष और परिवर्तन के नाम पर मिले जनादेश ने वामदलों के चौंतीस साल पुराने अभेध्य लगने वाले किले को ढाह दिया। वाम मोर्चा विकल्पहीनता को अपनी शाश्वतता बैठा था। वाम दलों को ममता ने पतन का पाताल दिखा कर यह साबित कर दिया कि लोकतन्त्र को सत्ता के घमंडी हथियारों से दीर्घ काल तक हाँका नहीं जा सकता। जनता ने वामपंथी सरकार की हेकड़ी को तोड़ते हुए ममता के हाथों में सत्ता कि कुंजी सौंप कर यह बता दिया है कि जनता जनार्धन लोकतन्त्र में सर्वोपरि है। जनता किसी को भी अर्श से फर्श तक ला सकती है। बंगाल के चुनावों ने यह दिखा दिया है। जनता ने धमकियों और घुड़कियों को अनदेखा कर उम्मीदों को अपना मत दिया है।

 बंगाल में संघर्ष और ममता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ममता ने जनता के मुद्दों को लेकर विपक्ष में रहते हुए ही नहीं बल्कि गठबंधन सरकार में रहते हुए भी सरकारों से लड़ाइयाँ लड़ी हैं। इसी संघर्ष ने ममता को जनता की दीदी बनाया और जनता ने दादा की जगह दीदी को बंगाल का मुख्यमंत्री चुना। यह बदलाव कोई रात भर में नहीं हुआ। इसके लिए सालों का संघर्ष और ममता का जुझारू व्यक्तित्व जिम्मेदार है। इस बदलाव की झलकियाँ बंगाल में काफी पहले से ही नज़र आने लगी थीं। टीएमसी की रैलियों में बढ़ती भीड़ ही बता रही थी कि अब दीदी कि बारी है। लेकिन ममता के जीत का सबसे ज़्यादा जोश नौजवानों में दिख रहा है, जिन्होंने अपनी पैदाइश के बाद से सिर्फ लाल रंगों में रंगे फरमान ही सुने, जिनके लिए पार्टी का मतलब लेफ्ट था। बंगाल में अब यदि हारा रंग छाया है तो यह हारा रंग डालने वाले निश्चित रूप से युवा ही हैं। यह वही ममता है जो शुरुआत से अपने बागी तेवरों के लिए जानी जाती रही है। पुराने दिनों के साक्षी आज भी 1977 की ममता को नहीं भुला पाएँ पायें है, जब ममता ने जेपी के कार के आगे छलांग लगा कर अपना विरोध दर्ज़ कराया था।

जमीनी राजनीति से जुडने के लिए ममता ने 1998 में खुद को कांग्रेस से अलग किया और अपनी पार्टी बनाई। तब उन्होने पूरे बंगाल की यात्रा की। इस बीच जनता ने यह भी देखा कि कैसे सरकार के इशारे पर दीदी को बालों से खिंच कर राइटर्स बिल्डिंग से निकाला गया। अब वही राइटर्स बिल्डिंग बंगाल की प्रथम महिला मुख्यमंत्री का इंतज़ार कर रहा है। इस दौर में ममता पर कई जानलेवा हमले भी हुए जो इतिहास में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पतन के रूप में याद रखे जाएंगे। लेकिन ममता ने अपना संघर्ष जारी रखा और लगातार समय अंतरालों पर वाम दलों को झटके देती रहीं। ममता के धरने और उनसे मिला जनसमर्थन इस बात की तसदीक करते है चाहे वह कोलकाता में मानव अधिकारों के लिए भूख हड़ताल हो या नंदीग्राम का एतिहासिक 21 दिनों तक चला अनशन सभी उन दिनों ममता के लिए बहुमत इकट्ठा कर रहे थे। ममता ने हर गलत नीति पर हल्ला बोला और जनता की परेशानियों को सुर दिया। ममता ने वामदलों के द्वारा छले गए मुसलमानों को भी अपने भाषणों और चिंता के केंद्र रखा और ममता उन्हें यह समझाने में कामयाब रही की वो ठगे गए हैं। अपने ठगे जाने का बदला इस बार मुसलमान वोटरों ने वामदलों से ले लिया।

ममता को घरेलू नायिका समझ रहे वामपंथी सरकार अपने हार के चाहे जीतने भी तर्क गढ़े लेकिन सच तो यह है कि अगर पश्चिम बंगाल कि जनता ने दो तिहाई से ज़्यादा बहुमत दे कर ममता को चुना है, तो इसके लिए वामदलों की गलत नीतियाँ जिम्मेदार हैं। 70-80 के दशक में बंगाल में वाममोर्चा की सरकार ने सबसे बेहतरीन भूमिसुधार कानून लागू किया और वह जनता के दिलों पर राज करने लगी। इसलिए यहाँ आज भी 45 प्रतिशत लोग खेती करते हैं। उस दौरान वाममोर्चा ने अपने पार्टी कैडरों को गाँव-गाँव तक पहुंचाया। जो कालांतर में लोकतान्त्रिक समाज के दल के सदस्य के रूप में नहीं बल्कि राजाओं के करीबी के रूप में व्यवहार करने लगे। नतीजा यह हुआ कि सरकारी नीतियाँ सीपीएम के दफ्तर से क्रियान्वित होने लगी, लोगों के मुक़ाबले कैडरों को इसका फायदा मिलने लगा। एक समय में पार्टी की हालत यह थी कि कैडरों के मनमानी के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सैफुदिन चौधरी को पार्टी से निकाल दिया गया। 34 साल के वाम शासन में एक भी जातीय हिंसा नहीं हुई लेकिन कड़वा सच यह भी है कि जिन मुसलमानों ने वाम का साथ नहीं दिया वह अब तक उपेक्षित रहे। वाम शासन के दौरान दलित पिछड़े आदिवासी लगातार हाशिये पर खड़े रहे। इन 34 सालों में कई लघु उद्योगों ने दम तोड़ा। किसान मजदूर लगातार गरीब होते चले गए। इन सब के लिए वाम मोर्चे की गलत नीतियाँ जिम्मेदार हैं। क्योंकि साढ़े तीन दशक का शासन काल कम नहीं होता। अगर राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो सरकारें विकास की गंगा बहा राज्य को समृद्ध कर सकती है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि विकास करना तो दूर वाममोर्चा विकास का स्वरूप तक इन साढ़े तीन दशकों में निर्धारित नहीं कर सकी पश्चिम बंगाल में दीर्घ कालिक वाममोर्चा सरकार की हर योजना को कार्यकर्ताओं की लालच ने लील लिया।


ममता की जीत के साथ ही उनके लिए वास्तविक चुनौतियाँ प्रारंभ होंगी। राज्य में नौकरियों की भारी किल्लत है, जिसके ख्वाब दिखा कर वो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची है, इन ख्वाबों को पूरा करना ममता के लिए बड़ी चुनौती है, भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र को अंदर तक खा चुका है। निवेशक ममता के जन आंदोलनों से बिदके हुए हैं, बिजली की कमी है और जो है, बहुत महंगी है। राज्य पर फिलहाल 2 लाख करोड़ का कर्ज़ है इसे चुकता करते हुए राज्य को आत्मनिर्भर बनाना ममता के लिए चुनौती होगी। वहीं राज्य में जारी वित्य संकट को दूर करने के लिए केंद्र से मिलकर वित्य पुनर्निर्माण पैकेज तैयार करने की कोशिश करनी होगी। राज्य में मँझोले एवं लघु उद्योगों को नए सिरे से बसाने का प्रयास करना होगा। साथ ही उद्योग और कृषि को साथ लेकर चलना होगा इससे ममता अपनी उद्योग विरोधी छवि को भी तोड़ सकेंगी। ममता को सियासत की चाभी चाहे जितनी आसानी से मिली हो पर बंगाल का यह ताज उनके लिए कांटों भरा होगा। ममता को यह समझना होगा की वामदल के पीछे एक विचारधारा वाली राजनीति काम कर रही है। जिसके बरक्स अगर जनता ने ममता को चुना है तो इसलिए क्योंकि ममता की बातों में जहां जनवादिता की खुशबू है वहीं उनके वादों में एक समृद्ध बंगाल झलकता है।  समृद्धि के इस सपने को सकार करने का दुरह काम ममता को करना है और वह भी वाम दलों से कम समय में।


2 MAY 2011 D.N.A LUCKNOW संस्करण में प्रकाशित