Saturday, 4 June 2011

किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक


खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए। इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं। दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए।

इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है। आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर( अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।

दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है।

मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए।

भाई साहब,किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।
साभार -रविश कुमार 

Friday, 3 June 2011

शंका में संघ

क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कही गुम हो गया है। क्या संघ परिवार के भीतर आतंकवादी हिंसा के दाग का दर्द है। क्या आरएसएस अयोध्या पर जा रुके हिन्दुत्व को नये तरीके से परिभाषित करना चाहता है। क्या स्‍वयंसेवक अब भाजपा के पीछे चलने को तैयार नहीं है। क्या संघ कोई नयी व्यूह रचना में लगा है। चाहे यह सारे सवाल हों, लेकिन संघ परिवार के भीतर यही सवाल ऑक्सीजन का काम कर रहे हैं। क्‍योंकि पहली बार आरएसएस यह मान रहा है कि बिछी हुई बिसात में ना तो भाजपा सियासी फन काढ़ सकती है और ना ही संघ सामाजिक तौर पर अपनी ताकत बढ़ा सकता है। और अगर वह फेल है तो पास होने के लिये उसे नये सिरे से नयी परिस्थितियां खड़ी करनी होंगी। इस सवाल ने संघ ने कुछ ऐसे निर्णयों पर सोचने का मन भी बनाया है जिन पर अभी तक रास्ता निकालने की जद्दोजहद ही समायी रहती थी। यानी जहां फेल हो रहे हैं उसके कारण खोजे जायें। उन्हें ठीक किया जाये। क्‍योंकि अखिरकार सभी को साथ लेकर ही तो चलना है। यह सोच पहली बार बदल रही है। राजनीति का रास्ता भाजपा तभी तय करती जब आरएसएस सामाजिक लकीर खींच देता है। लेकिन, संघ लकीर ना खींचे तो पाकिस्तान से लेकर महंगाई तक और किसान से लेकर भ्रष्‍टाचार तक के मुद्दों पर भाजपा कहीं नजर नहीं आती है। ऐसे में राजनीति में हाथ जलाये बगैर कौन सा प्रयोग संघ को सामाजिक तौर पर मान्यता दिलाते हुये सियासत पलट सकता है।

1974 के बाद पहली बार संघ में इस बात पर कुलबुलाहट शुरू हुई है। पहली सहमति है कि तरीका सियासी या भाजपा के कांधे पर सवार होकर नहीं चलेगा। दूसरी सहमति है कि संघ परिवार के सभी संगठन अपने अपने दायरे को बड़ा करते हुये अगर आदिवासी, किसान, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, लघु उघोग से लेकर छात्र और मजदूरों के सवालों को ही उंठाये, तो नयी बिसात बिछाने में कोई परेशानी हो नही सकती। यानी किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मजदूर संघ, लघु उद्योग भारती समेत चालीस से ज्यादा क्षेत्रों में कार्यरत संघ के स्वयंसेवक बीते सात बरस में रुक गये हैं। सात बरस पहले संघ साप्तहिक या मासिक तौर पर देश भर में 5827 स्थानो पर बैठक किया करता था। लेकिन, उसके बाद से यह घटते-घटते तीन हजार तक आ पहुंचा। वहीं 2004 तक यानी भाजपा की सत्ता रहते हुये भी सत्ता भोग रहे स्वयंसेवक भी विभिन्न संगठनों में शिरकत किया करते थे। लेकिन सत्ता गंवाने के बाद भाजपा और आरएसएस के बीच के तार सिर्फ राजनीतिक मुद्दों को लेकर ही जुड़े। धीरे-धीरे यह संबंध ऐसे बेअसर हो चुके हैं कि संघ की किसी भी पाठशाला में भाजपा नेताओं की मौजूदगी संघियों में गुस्सा पैदा करती है और भाजपा भी संघ को अयोध्या के घेरे से बाहर देख नहीं पाती। इसलिये भाजपा की राजनीतिक बैठकों में संघ के स्वयंसेवकों की मौजूदगी दिल्ली के माडरेट राजनेताओं को दूर कर देती है। इसका पहला असर तो यही हुआ है कि आरएसएस संघ मंडलियां घटकर 5629 तक आ पहुंची हैं, जो 2003 में 7037 हुआ करती थीं। हालांकि देश के भीतर के हालातों ने संघ के महत्व को भी बढ़ाया है और 2700 से ज्यादा प्रचारकों में से करीब साढे पांच सौ प्रचारक जो अलग-अलग संगठनों में लगे हैं उनके काम बढ़े हैं। आम-आदमी से जुड़े जो मुद्दे प्रचारकों की बैठको में उठते हैं उसमें पहली बार यह सवाल भी उठे हैं कि राजनीतिक तौर पर जब भाजपा इन सवालो का सामना करने को तैयार नहीं है या फिर भाजपा सफल नहीं हो पा रही है, तो संघ को भाजपा के पीछे क्यों खड़े होना चाहिये।

भ्रष्‍टाचार और महंगाई का सवाल भाजपा ने ना सिर्फ उठाया बल्कि उसकी राजनीतिक शुरुआत असम से की। और असम के चुनाव में संघ परिवार भी भाजपा के पीछे खड़ा हुआ। यहां तक कि संघ की शाखायें भी राजनीतिक तौर पर असम में मुद्दों पर चर्चा करने लगीं। लेकिन, भाजपा का हाथ खाली ही रहा। और इस चुनावी हार ने आरएसएस के उत्तर-पूर्वी राज्यों के बोडोलैण्ड से लेकर बांग्लादेशी जैसे मुद्दों को भी सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया। यानी संघ के भीतर नया सवाल यह भी है कि जिन सामाजिक मुद्दों पर संघ ने अपनी पहचान बनायी और जिन मुद्दों पर भाजपा की सियासत में सामाजिक सरोकार के टांके लगे वही सुनहरे टांके अब संघ परिवार को भाजपा की वजह से चुभ रहे हैं। ऐसे ही सवाल किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच के दायरे में भी हैं। इसलिये आरएसएस अब खुद को मथने के लिये तैयार हो रहा है। और मथने के इस दौर में मुद्दों के आसरे जिन स्थितियों को संघ बनाने में जुटा है उसमें सामाजिक-राजनीतिक का ऐसा घोल भी घुल रहा है जो भाजपा के विकल्प की दिशा में बढता कदम भी हो सकता है। अन्ना हजारे के मंच पर संघ की पहल। बाबा रामदेव के साथ खडे गोविन्दाचार्य की अनदेखी कर रामदेव के उठाये मुद्दों पर स्‍वयंसेवकों को साथ खडा करने की सोच। स्पेक्ट्रम घोटाले के खिलाफ खडे सु्ब्रहमण्यम स्वामी के जरिये संघ के सवालों को धार देने का प्रयास। किसानों की त्रासदी को बिगड़ी अर्थवयवस्था से जोड़ने का प्रयास और महंगाई को समाज में बढ़ती असमानता के अक्स में देखने और दिखाने की जद्दोजेहद।

और इन सारे प्रयासों में आरएसएस कभी भी भाजपा के नेताओं या उनकी राजनीतिक शिरकत के साथ नहीं रही। तो क्या संघ राजनीतिक तौर पर भाजपा की वर्तमान जरुरतों को दूसरे आंदोलन वाले चेहरो के आसरे पूरा कर रही है। या फिर पहले आरएसएस की पारंपरिक परिभाषा को नये कलेवर में रखना चाह रही है। क्‍योंकि एक तरफ सुब्रहमण्यम स्वामी संकेत देते हैं कि हिन्दुत्व की नयी परिभाषा संघ को गढनी होगी। और सोनिया गांधी का जवाब अब भाजपा के पास नहीं है और अयोध्या में ठिठका हिन्दुत्व भी सोनिया के सेक्यूलरवाद में सेंध नहीं लगा सकता। वहीं स्वदेशी जागरण मंच से गुरुमूर्त्ति संकेत देते है कि मनमोहन सिंह की अर्थव्यवस्था के भ्रष्‍टाचार से भाजपा इसलिये नहीं लड़ सकती क्‍योंकि उसके पास न तो वैकल्पिक इकनॉमी का कोई मॉडल है और ना ही वह खुद भ्रष्‍टाचार से मुक्त है। जबकि आरएसएस को स्वदेशी मॉडल को बदलना होगा। यही सवाल मजदूर संघ को लेकर भी हैं। क्‍योंकि मनमोहन सिंह की अर्थवयवस्था में जब ट्रेड यूनियन ही मायने नही रख पा रही है और बाजार अर्थव्यवस्था पर नकेल कसने का सवाल खडा करने वाली वाम सत्ता को भी जब जनता ने ध्वस्त कर दिया तो फिर आरएसएस की संख्या किसी भी राजनीति पार्टी को कितना लाभ पहुंचा सकती है। अब यह भाजपा भी जान रही है और संघ भी। इसलिये संघ के सामने नया सवाल यही है कि संघ के मुद्दे जब तक राजनीति के केन्द्र में ना आयेंगे तबक आरएसएस के सवाल भाजपा के पीछे ही चलेगे और भाजपा कांग्रेस की कार्बन कापी ही नजर आयेगी। इसलिये आरएसएस के भीतर नयी वैचारिक उठा-पटक उन मुद्दों के आसरे अपने संगठनो को खड़ा कर राजनीति की धारा को अपने अनुकूल करने की ही है।

संघ समझ रहा है कि राजनीतिक तौर पर 1974 की तर्ज पर जेपी का कोई राजनीतिक प्रयोग तो संभव नहीं है, लेकिन बाबा रामदेव के आसरे ही सही अगर संघ को जगाया जा सकता है और सरकार को चेताया जा सकता है तो 2014 तक भाजपा के बदले एक नया राजनीतिक संगठन भी खड़ा किया जा सकता है, जो राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता पाये और विकल्प भी बने। क्‍योंकि मनमोहन सरकार से आम आदमी को मोह भंग हो चुका है, लेकिन काग्रेस का विकल्प भाजपा हो इसे लोग स्वीकारने की स्थिति में नहीं हैं। और संघ अब भाजपा को शह देने की स्थिति में भी नहीं है। नयी परिस्तितियों में रामदेव हों या अन्ना हजारे, हर किसी को आंदोलन के लिये जो संगठन चाहिये वह सिर्फ आरएसएस के पास है, और नयी परिस्थितियां पहली बार संघ को उसी दिशा में ले जा रही है जहां रेड्डी बंधुओ पर आपस में भिड़ी भाजपा को दफन किया जा सके और संघ ही एक वैकल्पिक सोच का आईना बने । जहां भविष्य में संघ में किसी मुद्दे को लेकर अयोध्या की तर्ज पर ठहराव ना हो। और नयी पीढी यानी युवा तबका संघ को पारंपरिक ना मान कर भारतीय सामाजिक परिस्थितियों को वैज्ञानिक तरीके से अपने अनुकुल पाये, और संघ की पहल इसी सोच को जोड़ते हुये उन खतरों को उठाते चले जो देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगाये हुये हैं। पहला प्रयोग बाबा रामदेव से शुरू होना है इसलिये इंतजार कीजिये। क्‍योंकि संघ का नया रास्ता इससे भी तय होगा लेकिन संघ जीते या हारे दोनों स्थितियों में भाजपा खतरे में है यह तो तय है                                                                                                                                                                                            साभार -पुण्य प्रसून बाजपेयी

Wednesday, 1 June 2011

पत्रकारिता का विचार-वाचन काल

दसवीं की हिन्दी की किताब में किसी मशहूर लेख का हिस्सा था। तुलसी के बारे में किसी महान लेखक ने लिखा था शायद। खैर यह संदर्भ ग़लत भी हो तो कोई बात नहीं। मैं पहली पंक्ति यानी प्रमेय का इतना सा मतलब समझता हूं कि एक व्यक्ति में जीवन के तमाम पहलुओं को विचारने और बोलने की क्षमता आ जाए तो वो ऐसे प्रमेयों पर खरा उतरता है। टीवी ने एक ऐसा चैट ब्रिगेड पैदा कर दिया है जो दस मिनट में किसी भी बहुमुखी समस्या पर एकमुखी जवाब देने में माहिर हैं। हबर-हबर सवालों को ठेल-ठेल कर अपने जवाबों के लिए स्पेस बना लेते हैं। वो आते हैं। आते-जाते रहते हैं। कई बार समस्याओं की ऐसी परत खोल जाते हैं जो वायुमंडल में अनियंत्रित विचरित करने लगते हैं। टीवी तो ब्रेक लेकर लौट चुका होता है मगर सुनने वालों के कानों से मस्तिष्क तक की यात्रा में उनके विचार कैसे-कैसे रूप धरते होंगे मालूम नहीं।

टीवी पर चैट ब्रिगेड अब एक हकीकत है। टीवी के उदय के साथ ही आया। अख़बारों में तो इस चैट ब्रिगेड के हवाले पांच एकड़ का संपादकीय पन्ना कर दिया जाता रहा है। जिनमें हम सभी अपना कूड़ा और सोना एक साथ उगलते रहते हैं। जनमत निर्माण की प्रक्रिया में। सरकार,सेना,विश्वविद्यालय से रिटायर हुए इन चैट गुरुओं के दम पर टीवी का काम चलेगा। पत्रकारों को अब ऐसा मौका नहीं मिलेगा कि वो मौके पर जाने के अपने अनुभवों का सार दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर सकेंगे। इसलिए अब इन चैट गुरुओं के विशाल अनुभवों का लाभ उठाया जाने लगा है। टाइम्स नाउ ने इसे औपचारिक और सांस्थानिक रूप दे दिया है। दो घंटे तक दर्शकों का कौन वर्ग एक या दो मुद्दे पर लगातार अलग-अलग विचार वाचन सुन रहा है मालूम नहीं। सुन ही रहा होगा तभी हर तरफ उसकी अनुकृति दिखाई देती है। टाइम्स नाउ से पहले जब एनडीटीवी ने न्यूज़ आवर, बिग फाइट,मुकाबला और वी द पिपुल की शुरूआत की थी तब ऐसे शो सप्ताहांत में ठेले जाते थे। सीधी-बीत,कशमकश,मुद्दा, ज़िंदगी लाइव,सलाम ज़िंदगी,वर्सेस,अस्मिता जैसे कई शो अस्तित्व में आए। आप की अदालत ने तो पायनियर का काम किया है।

माना जाता था कि छुट्टी के दिन दर्शक विचार-वाचन सुनना पसंद करेगा। इन शो के लिए विचार वाचक खोजे गए। कई लोग इस आधार पर रिजेक्ट किए गए,जो जानकारी तो बहुत रखते थे मगर बोलने की शुरूआत पृष्ठभूमि और संदर्भ से करने लगते थे। हर सवाल का जवाब उस मुद्दे पर लिखी गई सारी किताबों का सार प्रस्तुत कर देने लगते थे। इसी ट्रायल एंड एरर में कई लोगों ने बाज़ी मार ली। उन्होंने खुद को ज़रूरतों के हिसाब से ढाल लिया। वो सवाल कोई सा हो मगर अपना जवाब तीस सेकेंड में वायुमंडल में ठेल देते हैं तो तरंगों पर सवार होकर आपके कानों तक पहुंचने लगा। बहुत से विचार-वाचक एंकर के मुकाबिल स्टार हो गए। उनकी पूछ इतनी बढ़ गई कि एक आदमी के पीछे पांच-पांच चैनल के गेस्ट रिलेशन के लोग पैदा हो गए। हर चैनल में गेस्ट रिलेशन संपादकीय टीम का हिस्सा हो गया। नेता,विचार-वाचक अब इस गेस्ट रिलेशन के लोगों के संपर्क में आ गए। पत्रकारों की जगह इन लोगों ने ले ली। जो जानकारी एक पत्रकार को होनी चाहिए कि किस विषय पर कौन कैसा बोलता है वो अब गेस्ट रिलेशन के लोग जानते हैं। इसीलिए इन्हें अब पत्रकार और संपादकीय टीम का हिस्सा मानना ही होगा। ख़बरों की भनक भी कई मामलों में इन्हें पत्रकारों से पहले लग जाती है। पर अभी इन्हें वो संपादकीय सम्मान नहीं मिला है।

ख़ैर,टाइम्स नाउ ने न्यूज़ आवर की परंपरा को आगे बढ़ाया। अब हर चैनल में विचार वाचन तुरंत होने लगा है। उसी दिन और उसी शाम। विचार-वाचन पत्रकारिता अब वीकेंड नहीं रही। डेली हो गई। जिस दर्शक के बारे में कहा जाता है कि समय नहीं है उसके पास ठहर कर ख़बर देखने-सुनने की इसलिए स्पीड न्यूज़ दो वही दर्शक ठहर-ठहर कर विचार सुन रहा है। वो भी रोज़। अब कोई तो बताये कि दर्शकों के पास कहां से घंटों विचार सुनने का वक्त पैदा हो गया है। हिन्दी-अंग्रेजी कोई सा भी चैनल हो किसी न किसी पर कोई न कोई गेस्ट होता ही है। विचार-वाचकों का न्यूज़ रूप में औपचारिक नाम गेस्ट होता है। जिसे एंकर लाइव होते ही जानकार बताता है। मुझे विचार-वाचक तुलसी की तरह लगते हैं। इन्हें जीवन का हर दर्शन मालूम होता है। ये हर सवाल का मुकम्मल जवाब दे सकते हैं। अखबारों में भी नए-नए विचार वाचक ढूंढे जा रहे हैं। वहां भी टीवी की प्रक्रिया का असर हो रहा है। वहां भी जानने वाले की जगह पहचाने जाने वाले को ढूंढा जा रहा है। जो फेस है वही रेस में है। जो फेस नहीं है वो आउट। विचार का संबंध जानकारी से कम पहचान से ज्यादा हो रहा है।

पाकिस्तान को लेकर ही सारी थ्योरी अपनी जगह पर स्थिर है। मगर विचार-वाचक आकर उसे प्लावित कर देते हैं। किसी भी बहस में पाकिस्तान को लेकर उम्मीद पैदा नहीं की जाती। उसके आवाम की कोई तस्वीर नहीं बनती। सिर्फ धांय-धांय बात-बम फेंका जाता रहा है। कितने साल से कहा जाता रहा है कि पाकिस्तान नाकाम और नापाक हो चुका है। मगर पाकिस्तान तो अपनी जगह पर कायम है। चुनौतियां किस मुल्क के इतिहास में नहीं आतीं। बात और है कि पाकिस्तान की यह रात थोड़ी लंबी हो गई है। पाकिस्तान को लेकर होने वाली हर बहस में भारत को जीतना ही क्यों ज़रूरी होता है। सियासी प्रवक्ता तो हर सवाल पर एक ही बात करते हैं। इनका-उनका चलता रहता है। उनकी बातों को ध्यान से सुनें तो कोई नतीजा नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि बिना साइलेंसर वाली बाइक भड़भड़ाते हुए मोहल्ले से गुज़र गई। जब तक आपने खिड़की खोली कि हुआ क्या है तब तक न धुआं बचता है न शोर। सियासी प्रवक्ता शाम को टीवी पर आने में माहिर हो गए हैं। इनमें शरद यादव जैसे माहिर नेता भी हैं। साफ मना कर देते हैं। कहते हैं सियासी बातें ऐसे नहीं होती हैं। लेकिन बाकी लोगों को तो पार्टी की तरफ से काम दिया गया है कि टीवी में बोलना है। उनकी बात को काटने का प्रमाण तो होता नहीं। सिर्फ एंकर के भयंकर और नवीनतम सवाल होते हैं। लगता है कि बम ही छोड़ दिया लेकिन छुरछुराने के बाद कोई धमाका नहीं होता। क्योंकि कई जगहों पर अब रिपोर्टर ख़बर नहीं,गेस्ट लाने लगा है।

आप देखते रहिए माफ कीजिएगा सुनते रहिए टीवी।पर एक बात है अच्छा बोलने वाला मिले, धज और धमक से तो बहस में वाकई मज़ा आ जाता है। नई दलील आ जाए,नई बात आ जाए तब। कई बार यही गेस्ट रिपोर्ट की अधूरी ख़बर को अपनी जानकारियों से पूरी भी कर देते हैं। यह शुक्ल पक्ष है। बहरहाल,विचार-वाचन पत्रकारिता का औपचारिक स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि ये मौजूद तो टीवी के आने के समय से ही है। टीवी दिखाने की जगह बोलने की चीज़ हो गया है। लोकसभा टीवी से लेकर तमाम टीवी में लंबी-लंबी चर्चाएं हो रही हैं। अमर्त्य सेन ने ठीक ही कहा है कि हम बातुनी इंडियन हैं। हर जगह वही लोग बोल रहे हैं। वही लोग सुन रहे हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा बोल रहे हैं। कुछ लोग वही बात बार-बार अच्छा बोल रहे हैं। जो बोलता है वो दिखता है। नया फार्मूला। वैसे है पुराना। नया कहने से थोड़ा कापीराइट का क्लेम आ जाता है।

            - साभार कस्बा  

Friday, 27 May 2011

स्वर हीनता के दौर में किसानी


                    

      

   -के.बाबला 
भारत की 2020 में वैश्विक स्थिति क्या होगी इस पर लगातार प्रधानमंत्री से लेकर विद्यालयों के प्राचार्य अपना मत प्रकट करते इन दिनों मिल जाएंगे। पर इस सबसे बड़े लोकतन्त्र में, सबसे बड़ी आबादी वाले कृषक समाज की ख़ोज-ख़बर लेने वाला कोई नहीं दिखता। जब प्रथम पंच वर्षीय योजना के प्रारूप को विनोवा भावे के सामने ले जाया गया तो उन्होने पूछा था इसमें किसान कहाँ है? अगर वर्ष 2011-12 के बजट के समय तक विनोवा ज़िंदा रहते तो निश्चित रूप से उनका प्रश्न कुछ इस तरह का होता- क्या इस देश में अब किसान नहीं रहते हैं? वर्तमान बजट के कुल हिस्से में मात्र 2% खेती-किसानी के लिए रखा गया है। आर्थिक उदारीकरण ने जहां किसानों कि कमर तोड़ दी वहीं सरकारी उदासिनता से ग्रस्त किसान अब लाचार हो गए हैं आत्महतयाएं करने को। पर क्या आत्महत्या उसी समय मानी जाएगी जब अपनी इह लीला समाप्त करने वाला किसान सरकारी तौर पर कर्ज़ में डूबा हो? क्या उसी किसान को खुद को मारने वाला कहा जाएगा जिसमें ऐसा करने की इच्छा थी और क्या आत्महत्या जानबूझकर स्वयं को मारना है? कोई भी किसान आत्महत्या एकदम तात्कालिक कारणों से नहीं करता बल्कि उसके निर्णय के पीछे पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दवाब काम करते हैं। विभिन्न संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा आत्महत्याओं के कारणों की अनेक प्रकार से व्याख्या की गयी है। सरकार ने इन आत्महत्याओं का कारण मुख्यत फसल बिगड़ जाने को माना है। आत्महत्याओं से निपटने के लिए सरकार दो तरीके से काम करती है। अव्वल पैकेज की घोषणा कर दूसरा दोयम किसानों को मनोवैज्ञानिक मदद देने के लिए आत्मविश्वास जागृति अभियान के तहत भजन-कीर्तन करा कर। दुर्भाग्य से इन सभी उपायों ने देश में छोटे-बड़े 85% किसानों के व्यवस्थातमक प्रकृति को नज़र अंदाज़ किया गया है। किसान नेता विजय जावधिया के आनुसार- जिस संकट ने किसनों को आत्महत्याएँ करने को मजबूर किया है उसके मुख्य दो कारण है। लागत बढ़ने से आर्थिक तंगी और देश के बाज़ारों को दुनिया के लिए खोलने के कारण फसलों की कीमतों में उतार चढ़ाव है।
किसान के लिए आवाज़ उठाने वालों की संख्या नाम मात्र की रह गई है बौद्धिक वर्ग, समाजसेवी और नेता किसानी की समस्या को चूल्हा समझ पनी रोटियाँ सेंकने में लगे हैं। जो भी आंदोलन हुए वे किसानों के लिए नहीं बल्कि भूमिहीन मज़दूरों के लिए, किसान मज़दूरों के लिए हुए। जिसमें हमेशा ही किसान शोषक ठहराकर उसको दुर्लक्षित किया गया। उसकी समस्याओं को लेकर कभी कोई आंदोलन हुआ ही नहीं। गत 60 सालों में किसानों का यह लोकतन्त्र किसानों के लिए कोई ठोस योजना बनाने में नाकामयाब रहा है। मार्क्सवादी विचारधारा में कहा गया था कि किसान मजदूरों का शोषण कर पूंजी का निर्माण करते है, लेकिन आज किसानी के रॉ माटेरियल के शोषण से पूंजी का निर्माण हो रहा है। कृषि आंदोलनों के दौर में एक मात्र शरद जोशी जी ने यह बात राष्ट्र के सामने राखी थी।
आत्महत्या एक प्रक्रिया है जो सालों से किसानों की अनदेखी के करणों का परिणाम है। किसान आत्महत्या को समझने के लिए किसानों के परिवेश को समझना जरूरी है। भूमंडलीकरण से पहले महराष्ट्र के किसान आनज उपजाने पर ध्यान देता था तथा पूरक के तौर पर किसान के पास पशुपालन थी। जिसके चारे की पूर्ति फसल के सह-उत्पाद से ही हो जाता था, यदि फसल खराब भी होती थी तो किसान पशुपालन से अपना जीविकोपार्जन कर लेता था। फिर 1991 में भूमंडलीकरण का दौर आने के साथ किसान को मार्केट नीति के अनुसार कैश क्राप उपजाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाने लगा। आनज की खेती कम हो गई। पशुपालन खुद ब खुद किसान से दूर होता चला गया। भूमंडलीकरण आपने साथ वर्चस्व का बाज़ार, लाभ आधारित संबंधों पर बनी एकल संस्कृति लेकर आता है। यही वो समय था जब युवा किसान खेती छोड़ शहर का रुख कर रहे थे। गावों में खेती के लिए ज़मीन तो थी पर लोगों का शहर की ओर पालयन जारी रहा। खेती मजदूरों के आसरे होने लगी। अब भूमंडलीकरण का असर खेती पर भी दिखने लगा था मजदूरी दर बढ़ चुकी थी लेकिन आनज और सस्ता होता जा रहा था।
खेती तो हमेशा से ही किसानों के लिए जुआ ही रही है पर नकदी फसल के प्रचलन ने इसके रिस्क फैक्टर को और बढ़ा दिया। कृषि संसाधन सही हो तभी अच्छी फसल की उम्मीद कर सकते हैं। हानिकारक उर्वरक, कीटनाशक से खेत की उपजाऊ शक्ति कम हो जाते हैं। किसान को अब हर बार उर्वरक, कीटनाशक के लिए किसान को बाज़ार का रुख करने की जरूरत होती है। इन सब के बीच अगर फसल अच्छी नहीं हुई तो किसान के पास जमा पूंजी के आलवा और कुछ नहीं होता। फिर त्यौहार, बेटी की शादी के लिए पैसे की जरूरत ने किसानों को साहूकारों की चोखठ पहुचा देता है। कर्ज़ के बोझ के तले दबे हताश, निराश, किसान नशे को अपनाता है। अंत में परिस्थितियों से हारकर किसान अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लेता है।             
 सरकारी योजनाओं की खबर लें तो ये भरी भरकम आंकड़ों के साथ हमारे सामने उपस्थित होते हैं। आत्महत्या की बढ़ती प्रवृति को रोकने के लिए सरकार ने वर्ष 2008-09 के लिए लगभग चार करोड़ किसानों के कर्ज़ माफ करने हेतु साठ हज़ार करोड़ का प्रावधान किया ताकि किसानों की खेती के प्रति रुझान बनी रहे। नेशनल सीड प्रोटेक्षण मिशन के तहत भी किसानों को बीज़, मशीन, संसाधन, नये तकनीक, प्रशिक्षण आदि की उपलब्धता प्रदान करने की कोशिश की गई है। इस मिशन पर 11वी पंचवर्षीय योजना (2007-11) के दौरान कुल परिव्यय 488.25 करोड़ का रखा गया है। इस योजना के तहत 17 प्रदेशों के 312 ज़िलों में लागू की जा रही है।
किसान को कभी से इन भारी भरकम आकड़ों से मतलब नहीं होता बल्कि धूप में अपने बदन जलाने वाला किसान खुद के दो जून की रोटी चाहता है। किसान समर्थित तमाम योजनाओं के बावजूद देश का पेट भरने वाला किसान भूखा, नंगा, अपने खेत में अपनी कब्र देखता है। जब अनाज के दाम बढ़ते हैं तब सरकार हस्तक्षेप करती है और निर्यात पर पाबंदी लगती है। जिसका नुकसान किसानों को झेलना पड़ता है। लेकिन जब दाम गिर जाते हैं तब सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करती।
किसानी के लिए किसान के पास सबसे बड़ा आसरा उसके पास अपनी ज़मीन का होना है। जब यही ज़मीन उससे छिन जाती है तो किसान की हिम्मत जबाब देने लगता है खेती उसके लिए कठिन ही नहीं अभिशाप भी हो जाती है। हमने देखा है कि हाल के कुछ वर्षों में सरकारों ने किसानों की ज़मीनों से कोई मोह नहीं दिखाया है। उसे लगातार पूँजीपतियों को सौंपा जा रहा है। इस प्रक्रिया ने किसानी की ताबूत में आखरी कील का काम किया है।  
दूसरे शब्दों में, जब किसान के पास न तो स्थिर पूंजी (ज़मीन) और न ही कार्यकारी पूंजी (बीज,खाद आदि) रह जाते हैं। तब उसके पास आत्महत्या करने के अलावा और क्या चारा रह जाता है? सर्वेक्षणों में पाया गया है कि कार्यकारी पूंजी आत्महत्याओं के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। इस तरह के करणों से 1997 से लेकर आज तक बीस लाख से अधिक किसानों ने मौत को गले लगाया है ।
दरअसल यह दुखद है कि आज भी इस देश के आखरी आदमी तक राशन की दुकान ही नहीं पहुँच पाई है। सरकारी उदासिनता और गलत नीतियों के कारण आज एक समाज जिसने वर्षों से पूरे सभ्य समाज के भोजन संबंधी ज़िम्मेदारी को अपने सर-माथे पर लिया है, ज़िंदा रहने के लिए अपने सामाजिक वातावरण से समझौता कर मजदूर बनने को मजबूर है। क्या हम कल्पना कर सकते हैं एक कृषक विहीन समाज की? एक ऐसा समाज जहां कोई किसान नहीं होगा?

2जून 2011 D.N.A LUCKNOW संस्करण में प्रकाशित


Sunday, 22 May 2011

बदला नहीं बदलाव की राजनीति

-के बाबला
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को माँ माटी मानुष और परिवर्तन के नाम पर मिले जनादेश ने वामदलों के चौंतीस साल पुराने अभेध्य लगने वाले किले को ढाह दिया। वाम मोर्चा विकल्पहीनता को अपनी शाश्वतता बैठा था। वाम दलों को ममता ने पतन का पाताल दिखा कर यह साबित कर दिया कि लोकतन्त्र को सत्ता के घमंडी हथियारों से दीर्घ काल तक हाँका नहीं जा सकता। जनता ने वामपंथी सरकार की हेकड़ी को तोड़ते हुए ममता के हाथों में सत्ता कि कुंजी सौंप कर यह बता दिया है कि जनता जनार्धन लोकतन्त्र में सर्वोपरि है। जनता किसी को भी अर्श से फर्श तक ला सकती है। बंगाल के चुनावों ने यह दिखा दिया है। जनता ने धमकियों और घुड़कियों को अनदेखा कर उम्मीदों को अपना मत दिया है।

 बंगाल में संघर्ष और ममता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ममता ने जनता के मुद्दों को लेकर विपक्ष में रहते हुए ही नहीं बल्कि गठबंधन सरकार में रहते हुए भी सरकारों से लड़ाइयाँ लड़ी हैं। इसी संघर्ष ने ममता को जनता की दीदी बनाया और जनता ने दादा की जगह दीदी को बंगाल का मुख्यमंत्री चुना। यह बदलाव कोई रात भर में नहीं हुआ। इसके लिए सालों का संघर्ष और ममता का जुझारू व्यक्तित्व जिम्मेदार है। इस बदलाव की झलकियाँ बंगाल में काफी पहले से ही नज़र आने लगी थीं। टीएमसी की रैलियों में बढ़ती भीड़ ही बता रही थी कि अब दीदी कि बारी है। लेकिन ममता के जीत का सबसे ज़्यादा जोश नौजवानों में दिख रहा है, जिन्होंने अपनी पैदाइश के बाद से सिर्फ लाल रंगों में रंगे फरमान ही सुने, जिनके लिए पार्टी का मतलब लेफ्ट था। बंगाल में अब यदि हारा रंग छाया है तो यह हारा रंग डालने वाले निश्चित रूप से युवा ही हैं। यह वही ममता है जो शुरुआत से अपने बागी तेवरों के लिए जानी जाती रही है। पुराने दिनों के साक्षी आज भी 1977 की ममता को नहीं भुला पाएँ पायें है, जब ममता ने जेपी के कार के आगे छलांग लगा कर अपना विरोध दर्ज़ कराया था।

जमीनी राजनीति से जुडने के लिए ममता ने 1998 में खुद को कांग्रेस से अलग किया और अपनी पार्टी बनाई। तब उन्होने पूरे बंगाल की यात्रा की। इस बीच जनता ने यह भी देखा कि कैसे सरकार के इशारे पर दीदी को बालों से खिंच कर राइटर्स बिल्डिंग से निकाला गया। अब वही राइटर्स बिल्डिंग बंगाल की प्रथम महिला मुख्यमंत्री का इंतज़ार कर रहा है। इस दौर में ममता पर कई जानलेवा हमले भी हुए जो इतिहास में पश्चिम बंगाल की राजनीतिक पतन के रूप में याद रखे जाएंगे। लेकिन ममता ने अपना संघर्ष जारी रखा और लगातार समय अंतरालों पर वाम दलों को झटके देती रहीं। ममता के धरने और उनसे मिला जनसमर्थन इस बात की तसदीक करते है चाहे वह कोलकाता में मानव अधिकारों के लिए भूख हड़ताल हो या नंदीग्राम का एतिहासिक 21 दिनों तक चला अनशन सभी उन दिनों ममता के लिए बहुमत इकट्ठा कर रहे थे। ममता ने हर गलत नीति पर हल्ला बोला और जनता की परेशानियों को सुर दिया। ममता ने वामदलों के द्वारा छले गए मुसलमानों को भी अपने भाषणों और चिंता के केंद्र रखा और ममता उन्हें यह समझाने में कामयाब रही की वो ठगे गए हैं। अपने ठगे जाने का बदला इस बार मुसलमान वोटरों ने वामदलों से ले लिया।

ममता को घरेलू नायिका समझ रहे वामपंथी सरकार अपने हार के चाहे जीतने भी तर्क गढ़े लेकिन सच तो यह है कि अगर पश्चिम बंगाल कि जनता ने दो तिहाई से ज़्यादा बहुमत दे कर ममता को चुना है, तो इसके लिए वामदलों की गलत नीतियाँ जिम्मेदार हैं। 70-80 के दशक में बंगाल में वाममोर्चा की सरकार ने सबसे बेहतरीन भूमिसुधार कानून लागू किया और वह जनता के दिलों पर राज करने लगी। इसलिए यहाँ आज भी 45 प्रतिशत लोग खेती करते हैं। उस दौरान वाममोर्चा ने अपने पार्टी कैडरों को गाँव-गाँव तक पहुंचाया। जो कालांतर में लोकतान्त्रिक समाज के दल के सदस्य के रूप में नहीं बल्कि राजाओं के करीबी के रूप में व्यवहार करने लगे। नतीजा यह हुआ कि सरकारी नीतियाँ सीपीएम के दफ्तर से क्रियान्वित होने लगी, लोगों के मुक़ाबले कैडरों को इसका फायदा मिलने लगा। एक समय में पार्टी की हालत यह थी कि कैडरों के मनमानी के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सैफुदिन चौधरी को पार्टी से निकाल दिया गया। 34 साल के वाम शासन में एक भी जातीय हिंसा नहीं हुई लेकिन कड़वा सच यह भी है कि जिन मुसलमानों ने वाम का साथ नहीं दिया वह अब तक उपेक्षित रहे। वाम शासन के दौरान दलित पिछड़े आदिवासी लगातार हाशिये पर खड़े रहे। इन 34 सालों में कई लघु उद्योगों ने दम तोड़ा। किसान मजदूर लगातार गरीब होते चले गए। इन सब के लिए वाम मोर्चे की गलत नीतियाँ जिम्मेदार हैं। क्योंकि साढ़े तीन दशक का शासन काल कम नहीं होता। अगर राजनीतिक इच्छा शक्ति हो तो सरकारें विकास की गंगा बहा राज्य को समृद्ध कर सकती है, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि विकास करना तो दूर वाममोर्चा विकास का स्वरूप तक इन साढ़े तीन दशकों में निर्धारित नहीं कर सकी पश्चिम बंगाल में दीर्घ कालिक वाममोर्चा सरकार की हर योजना को कार्यकर्ताओं की लालच ने लील लिया।


ममता की जीत के साथ ही उनके लिए वास्तविक चुनौतियाँ प्रारंभ होंगी। राज्य में नौकरियों की भारी किल्लत है, जिसके ख्वाब दिखा कर वो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची है, इन ख्वाबों को पूरा करना ममता के लिए बड़ी चुनौती है, भ्रष्टाचार सरकारी तंत्र को अंदर तक खा चुका है। निवेशक ममता के जन आंदोलनों से बिदके हुए हैं, बिजली की कमी है और जो है, बहुत महंगी है। राज्य पर फिलहाल 2 लाख करोड़ का कर्ज़ है इसे चुकता करते हुए राज्य को आत्मनिर्भर बनाना ममता के लिए चुनौती होगी। वहीं राज्य में जारी वित्य संकट को दूर करने के लिए केंद्र से मिलकर वित्य पुनर्निर्माण पैकेज तैयार करने की कोशिश करनी होगी। राज्य में मँझोले एवं लघु उद्योगों को नए सिरे से बसाने का प्रयास करना होगा। साथ ही उद्योग और कृषि को साथ लेकर चलना होगा इससे ममता अपनी उद्योग विरोधी छवि को भी तोड़ सकेंगी। ममता को सियासत की चाभी चाहे जितनी आसानी से मिली हो पर बंगाल का यह ताज उनके लिए कांटों भरा होगा। ममता को यह समझना होगा की वामदल के पीछे एक विचारधारा वाली राजनीति काम कर रही है। जिसके बरक्स अगर जनता ने ममता को चुना है तो इसलिए क्योंकि ममता की बातों में जहां जनवादिता की खुशबू है वहीं उनके वादों में एक समृद्ध बंगाल झलकता है।  समृद्धि के इस सपने को सकार करने का दुरह काम ममता को करना है और वह भी वाम दलों से कम समय में।


2 MAY 2011 D.N.A LUCKNOW संस्करण में प्रकाशित

Friday, 8 April 2011

अन्ना-मनमोहन का 15 मिनट का संवाद !




सिर्फ पन्द्रह मिनट की बातचीत ने ही अन्ना हजारे और प्रधानमंत्री के बीच लकीर खींच दी। मामला भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का था। और उस पर लोकपाल विधेयक के उस मसौदे को तैयार करने का था, जिससे आम लोगों का संस्थाओं पर से उठता भरोसा दोबारा जागे। 15 मिनट की बाचतीच कुछ इस अंदाज में हुई-
सरकार भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाना चाहती है और इसमें आपकी मदद चाहिये। हम तो तैयार हैं। हमने यही लड़ाई लड़ी है। लोकपाल विधेयक के जरीये यह काम हो सकता है, आप हमें बतायें उसमें कैसे आगे बढ़ें, जिससे सहमति बने और विधेयक अटके भी नहीं। प्रधानमंत्री जी जब तक इसके दायरे में हर संस्था नहीं आयेगी और जब तक कार्रवाई करने के बाद परिणाम जल्द से जल्द सामने लाने की सोच नहीं होगी, तब तक लोकपाल का कोई मतलब नहीं है। क्या आप चाहते है कि जो स्वायत्त संस्थाये हैं, उन्हे भी इसके दायरे में ले आयें। जी , बहुत जरुरी है। जैसे सीबीआई एक स्वायत्त जांच एजेंसी है लेकिन उसपर किसी का भरोसा नहीं है और सत्ता अपनी अंगुली पर उसे नचाती है और वह ना नाचे तो फिर सीबीआई के बाबुओं की भी खैर नहीं। चलिये ठीक है, लेकिन इसपर सरकार के भीतर भी तो सहमति बननी चाहिये। और सरकार के आठ मंत्री बकायदा भ्रष्टाचार को लेकर मसौदा तैयार कर रहे हैं । तो उन्हे प्रस्ताव तैयार करने दिजिये और आप अपने सुझाव दे दीजिये। नही, प्रस्ताव तैयार करने में सरकार के बाहर जनता की भागेदारी भी होनी चाहिये। तभी पता चलेगा कि सरकार से बाहर लोग क्या सोचते है और भ्रष्टाचार की सूरत में सत्ता में बैठे लोगो के खिलाफ कैसे कार्रवाई हो सकती है। लेकिन मंत्री भी तो जनता के ही नुमाइन्दे हैं । और आप अलग से जनता के नुमाइन्दों को कहां से लायेंगे। नुमाइन्दी का मतलब सिर्फ संसदीय चुनाव नहीं होता । शांतिभूषण जी कानून मंत्री रह चुके हैं और उन्होने सुप्रीम कोर्ट के भ्रष्टाचार तक पर अंगुली उठायी। जनता भी सोचती थी कि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार पर किस दिन कौन कहेगा। सरकार के तो किसी मंत्री ने कुछ नहीं कहा। लेकिन शांतिभूषण जी ने ताल ठोंककर कहा। तो इस तरह जो लोग अलग अलग क्षेत्रों से जुड़े हुये हैं और लोगों की भावना के करीब हैं, उन्हे लोकपाल विधेयक के मसौदे को तैयार करने में जोड़ा जायेगा। और अपन का तो मानना है कि प्रस्ताव तैयार में आधे सरकार के मंत्री हो और आधे असल जनता के नुमाइन्दे, जो उन सवालो को उठा रहे हैं, जिस पर से सत्ता ने आंखे मूंदी हुई है। यह कैसे संभव है। जब देश के आठ वरिष्ठ मंत्री भ्रष्टाचार को रोकने के लिये बनी कमेटी में काम कर रहे हैं तो उनके बराबर कैसे किसी को भी अधिकार दिये जा सकते हैं। प्रधानमंत्री जी आपको याद होगा जब जवाहरलाल नेहरु मंत्रिमंडल बना रहे थे और तमाम कमेटियां बनायी जा रही थी, तब महात्मा गांधी ने नेहरु से एक ही बात कही थी कि आजादी समूचे देश को मिली है सिर्फ कांग्रेस को नहीं। और यह बात लोकपाल विधेयक को लेकर भी समझनी चाहिये क्योंकि भ्रष्टाचार का मामला समूचे देश का मुद्दा है , यह सिर्फ सरकार का विषय नहीं है। लेकिन सरकार और मंत्री की जवाबदेही तो जनता के प्रति ही होती है। फिर आप गृहमंत्री, वित्तमंत्री, कानून मंत्री,कृषि मंत्री , मानव संसाधन मंत्री ,रेल मंत्री,रक्षा मंत्री से लेकर पीएमओ के मंत्री तक पर भरोसा क्या नहीं कर सकते।

हम इसकी व्यवस्था कर देते है कि चार मंत्री बकायदा आप लोगो के विचारो से लगातार अवगत होते रहे। और लोकपाल का स्वरुप भी उसी अनुकूल हो जैसा आप चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी यह कैसे संभव है। देश का समूचा कच्चा-चिट्ठा तो आपको भी सामने है। आप ही जिन मंत्रियो के जरीये लोकपाल या भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की बात कह रहे है, जरा उसकी तासिर तो देखिये। गृह मंत्री पी चिदबंरम का नाम विकिलीक्स खुलासे में आया कि कैसे शिवगंगा में चुनाव के दैराव उनके बेटे कार्त्ती ने नोट के बदले वोट का खेल किया। कारपोरेट घराने वेदांता के साथ उनके संबंध बार बार उछले हैं और वेदांता को इसका लाभ खनन के क्षेत्र में कितना मिला है, यह भी खुली किताब है। स्पेक्ट्रम मामले में अनिल अंबानी की पेशी सीबीआई में हो रही है और उनसे भी कैसे रिश्ते चिदंबरम के हैं, यह मुंबई में आप किसी से भी जान सकते हैं। प्रणव मुखर्जी तो देश के वित्त मंत्री रहते हुये अंबानी बंधुओं के झगड़े सुलझाने से लेकर उन्हें देश के विकास से जोड़ने के लिये खुल्लम-खुल्ला यह कहने से नही कतराते कि वह अनिल-मुकेश अंबानी को बचपन से जानते हैं।

अन्ना हजारे जी मैं खुद क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ हूं और इसका जिक्र मैंने 2007 में फिक्की के एक समारोह में किया था। इसके संकेत आपको पिछले मंत्रिमंडल विस्तार में दिखायी दिया होगा। जी, सवाल संकेत का नहीं है। वक्त कार्रवाई का है। आपको तो जन लोकपाल में ऐसी व्यवस्था करनी है कि लोकपाल के खिलाफ भी शिकायत आये तो उसका निस्ताराण भी एक माह के भीतर हो जाये। यह सिर्फ सरकार के आसरे कैसे संभव है। मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल को आपने ही टेलीकाम का प्रभार ए राजा के फंसने के बाद दिया। जाहिर है वह काबिल हैं तभी आपने अतिरिक्त प्रभार दिया। लेकिन हुआ क्या, सरकार का दामन बचाने के लिये उन्होने 2 जी स्पेक्ट्रम में कोई घोटाला भी हुआ है, इसे ही खारिज कर दिया और तर्को के सहारे कैग की रिपोर्ट को भी बेबुनियाद करार दिया। फिर कृषिमंत्री शरद पवार जी को आपने भ्रष्टाचार की रोकथाम वाली कमेटी में रखा है। अब आप ही बताईये हम उनसे क्या बात करेंगे। क्या यह कहेंगे कि लोकपाल में इसकी व्यवस्था होनी चाहिये किसी कैबिनेट मंत्री पर अवैध तरीके से जमीन हथियाने का आरोप लगता है तो इस पर फैसला हर हाल में महीने भर के भीतर आ जाना चाहिये। साबित होने पर देश को हुये घाटे की पूर्ति के साथ साथ कडी सजा की व्यवस्था होनी चाहिये।

कोई मंत्री अगर मुनाफाखोरो के हाथ आम आदमी की न्यूनतम जरुरतों को बेच देता है और बिचौलिया या जमाखोर उससे लाभ उठाते हैं और यह आरोप साबित हो जाये तो उस मंत्री के चुनाव लड़ने पर रोक लग जानी चाहिये। हम कौन सी बात पवार जी से कहेंगे, आप ही बताइये क्योंकि आप क्रोनी कैपटलिज्म के खिलाफ हैं और कांग्रेस खुले तौर पर कहती है कि शरद पवार कारपोरेट घरानो को साथ लेकर सियासत करते हैं। जिसका लाभ कारपोरेट को बीते पांच बरस में इतना हुआ है जितना आजादी के बाद कभी नहीं हुआ। सरकार और मंत्रियो के साथ खड़े कारपोरेट घरानो के टर्न ओवर में तीन सौ से लेकर तीन हजार फिसदी तक की बढोतरी अगर इस दौर में हुई और हर कारपोरेट ने अपने पैर देश के बाहर फैलाये तो उसके पीछे की अर्थव्यवस्था की जांच कौन करेगा। और लोकपाल बिल में यह सब कैसे आयेगा। फिर काग्रेस ने ही मंहगाई की जड में जब कृषि मंत्री को बताया और इसी दौर में जब कोई कड़ा कानून नहीं बनाया गया तब कैसे कानून मंत्री वीरप्पा मोईली अब लोकपाल को लेकर सक्रिय हो जायेंगे। प्रधानमंत्री जी यह सारे सवाल इस दौर में आपकी ही सरकार के मद्देनजर उठे हैं। इसलिये हमारे सामने सवाल लोकपाल बिधेयक को भी जन लोकपाल विधेयक में बदलने का है। इसीलिये हम जनता की भागीदारी का सवाल उठा रहे हैं।

अन्ना जी आपके कहे हर वाक्य की अहमियत मैं समझता हूं । लेकिन सरकार के कामकाज का अपना तरीका होता है और उस पर बिना सहमति बनाये कोई कार्य आगे बढ़ नहीं सकता। फिर सरकार सिर्फ कांग्रेस की नहीं है आपको समझना यह भी होगा। यह लोकतांत्रिक ढांचा है। मै आपको एक बात याद दिलाना चाहता हूं प्रधानमंत्री जी कि जब देश का संविधान तैयार हो रहा था तो उसका आखिरी ड्राफ्ट लेकर राजेन्द्र प्रसाद महात्मा गांधी के पास गये थे। तब गांधी जी ने एक ही सवाल राजेन्द्र बाबू से पूछा था। इस संविधान में गरीबो और पिछड़ों के लिये क्या है। और राजेन्द्र प्रसाद कोई जवाब दे नहीं पाये थे। मगर उसके बाद ही पिछड़ों को आरक्षण और गरीबो को राहत देने की बात संविधान में जुड़ी। अब लोकपाल और लोकायुक्त संस्था की स्थापना में आधी भागेदारी जनता की नहीं होगी तो फिर देश का मतलब तो वही सत्ता हो गयी जहां से भ्रष्टाचार की लौ फूट रही है। इसलिये मैं जनता के बीच इस मुद्दे को लेकर जाउंगा। अन्ना हजारे जी आप जैसा ठीक समझे आप बुजुर्ग हैं और हमें आपका मार्ग दर्शन चाहिये। मैं भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हूं और चाहता हूं कि आप सरकार को सहयोग दें।

और इस 15 मिनट की बातचीत के बाद अन्ना हजारे खामोश हो गये और वही पीएमओ की ड्योडी से उतरते उतरते उन्होंने मान लिया कि जन लोकपाल का रास्ता मनमोहन सिंह के रास्ते से नहीं निकलेगा बल्कि जनता के बीच से ही रास्ता निकालना होगा। तय किया कि इसलिये जिन्दगी के आखिरी उपवास पर आमरण बैठना ही गांधी का रास्ता अपना कर देश को रास्ते पर लाना होगा। और सत्ता को सीख देगी होगी।-पुण्य प्रसून वाजपेयी

Saturday, 2 April 2011

गम और भी हैं जमाने में क्रिकेट के सिवा


दरणीय प्रधानमंत्रीजी
सादर प्रणाम
इधर के दिनों में झंझावतों में लगातार घिरे रहने के बाद कल मोहाली स्टेडियम में आपको देखा। खुशमिजाजी के साथ घंटों बैठे हुए। पाकिस्तान से जीत हासिल होने के पहले तालियां बजाते हुए। सोनियाजी को भी देखा। बच्चों की तरह खुशी से चहकते-दमकते हुए। राहुलजी को देखा, जीत के जोश से उभरे जज्बे का भाव। कई-कई मंत्रियों को देखा, विपक्षी खेमे के नेताओं को भी। आमिर खान, प्रीटी जिंटा, सुनील शेट्टी जैसे बॉलीवुड कलाकारों को भी। अच्छा लग रहा था। सच कह रहा हूं। पूरा देश एक छत के नीचे। स्टेडियम में 25 हजार की भीड़ के साथ इतनी देर तक देश के आलाअलम लोग शायद ही कभी इतिहास में बैठे हों। कहीं नहीं पढ़ा-सुना। किसे धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आ रहा। क्रिकेट खेल के अविष्कारकों को, जिनकी वजह से यह दिन आया? भारतीय टीम के खिलाड़ियों को, जिन्होंने आप सबको वहां तक बुला लिया? या नये बाजार को, जिसने क्रिकेट को बुलंदियों तक पहुंचाकर देश में राष्ट्रीयता की भावना की व्याख्या नये सिरे से करना शुरू किया है?
मेरी उतनी समझ नहीं इसलिए राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता या क्रिकेट से कूटनीति वगैरह की बातें ज्यादा पल्ले नहीं पड़ती, लेकिन पता नहीं क्यों, टीवी पर आप सबों को देखते हुए बार-बार कुछ चीजें मन को कुरेदती रहीं। इससे आप राष्ट्र के प्रति मेरी निष्ठा या राष्ट्रीयता के प्रति मेरे सम्मान में कोई कमी नहीं समझिएगा। युद्ध की स्थिति और क्रिकेट के खेल, इन दोनों समय में ही राष्ट्र का एकीकरण होता है, राष्ट्रीयता की भावना जगती है, इसे मैं भी जानने-समझने-मानने लगा हूं। वरना, इस देश में कितने देश बन रहे हैं, हर कोई उपराष्ट्रीयता के छलावे के साथ अपनी ब्रांडिंग में लगा हुआ है, इससे मेरे जैसे लोग अवगत हैं। मेरी समझदारी पर तरस जरूर खाइएगा लेकिन राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता के संदर्भ में मेरी निष्ठा पर संदेह न कीजिएगा, प्लीज!
इसे सनकमिजाजी या पागलपंथी ही कहिए सर कि टीवी पर क्रिकेट का रोमांच परवान चढ़ रहा था और मेरे आंखों के सामने उस वक्त दो-ढाई साल पहले बिहार का एक दृश्य उभर रहा था। वही 2008 के कोसी के कोप का दृश्य, जब 25 लाख से अधिक की आबादी हाहाकार मचा रही थी। कोसी के तांडव से लोग मर रहे थे, तब केंद्र से आप लोगों को पहुंचने में चार-पांच दिनों का समय लग गया था। यह तय करने में कि यह राष्ट्रीय मामला है या नहीं, 100 घंटे से अधिक का समय लग गया था। याद है न सर! कोसी के इलाके अभी-अभी चार-पांच रातें गुजारकर लौटा हूं, जहां विकास के नाम पर महासेतु बनाकर फिर विनाश की बुनियाद तैयार कर रहे हैं आप दिल्लीवाले। तो शायद कोसी यात्रा का असर है कि क्रिकेट के समय में भी उसी की खुमारी छायी हुई थी। तभी तो आप और सोनियाजी वगैरह-वगैरह जब-जब दिख रहे थे, तब-तब कोसी के कोप वाले ढाई साल पहले के दृश्य सामने आ-जा रहे थे और फिर आपलोग भी याद आ रह थे।
यह बेवकूफी है सर, मुझे पता है लेकिन क्या करूं? राहुलजी को किसी बच्चे की तरह चहकते हुए देखकर अच्छा लगा। उन्हें कितना मिस कर रहा था क्रिकेट के समय, कह नहीं सकता। वे ही तो इकलौते दिल्लीवाले हैं, जो आदिवासियों को सखा-भाई-बंधु वगैरह-वगैरह बताते हैं। गांव में जाकर रात गुजारते हैं। झारखंड में पिछले दिनों हुए राष्ट्रीय खेल का आयोजन भी कल टीवी पर क्रिकेट देखते हुए बार-बार याद आने लगा। लगभग सात हजार खिलाड़ी देश के कोने-कोने से झारखंड में पहुंचे थे। वैसे-वैसे खेलों के खिलाड़ी, जो खेल सरकार के ही रहमोकरम पर जिंदा हैं। क्रिकेट के खिलाड़ियों से कोई कम जोश, जज्बा या उत्साह उनमें नहीं था सर, सच कह रहा हूं, हर दिन खेल में मौजूद था मैं। राष्ट्रीय खेल था सर, 34वां राष्ट्रीय खेल लेकिन आपलोगों में से कोई भी नहीं आया उसमें। न उदघाटन करने, न समापन करने। आप प्रधानमंत्री हैं, आपकी व्यस्तता का अंदाजा सबको है। राष्ट्रपति के आने के पेंच का भी अंदाजा हम जैसे लोगों को है। उपराष्ट्रपति भी नहीं आ सके यहां। और तो और, क्या कहूं सर, आपके खेल मंत्री भी नहीं आये थे यहां। आपके खेल मंत्री वही माकन साहब हैं न सर, जो कल तक इसी झारखंड में कांग्रेस के प्रभारी हुआ करते थे और गाहे-बगाहे यहां पहुंचकर मीडिया वालों के सामने झारखंड-झारखंड की रट किसी बच्चे की तरह लगाते थे। वे क्यों नहीं आये झारखंड के राष्ट्रीय खेल में सर, उनको आपलोगों ने क्यों नहीं भेज दिया जबरिया, इसका जवाब अब तक नहीं मिल पा रहा। आप सब व्यस्त रहे होंगे, खेल मंत्री के लिए तो वह एक बड़ा आयोजन था, वह तो आते, उन्हें तो भेजते आपलोग।
बहुत सवाल पूछते हैं अपने झारखंडी भाई लोग। कहते हैं कि कल संपदा का दोहन करना होगा तो झारखंड राष्ट्र का अभिन्न अंग हो जाएगा, कल माओवादियों का हमला होगा तो राज्य के वर्तमान और भविष्य का दिल्ली से ही खाका तैयार होगा और राज्य बनने के बाद पहली बार एक राष्ट्रीय आयोजन हो रहा था, तो यह राष्ट्र का अभिन्न अंग नहीं था। किसी को समय नहीं मिला। मालूम है सर, यहां के लोग पिछड़े हैं। मीन माइंडेड हैं, इसलिए ऐसी छोटी-छोटी बातों को बतंगड़ बना देते हैं। सच कह रहा हूं सर, मैं आपलोगों के क्रिकेटिया प्रेम का जरा भी विरोधी नहीं वरना यह सवाल ही सबसे पहले पूछता कि क्या किसी देश का पूरा सिस्टम एक खेल के लिए ठप किया जा सकता है! घोषित तौर पर। तब यह भी पूछता कि आखिर अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, फ्रांस जैसे देश क्या अब तक इस खेल से इसी डर से तौबा करते आये हैं कि यह राष्ट्रविध्वंसक खेल है, जो एक बार में पूरे राष्ट्र की गति को आठ-आठ घंटे तक रोक कर रख देता है। अमेरिका, चीनवाले खेल में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं, यह तो आप जानते ही हैं न सर। ओलिंपिक में देखे हैं कि नहीं। मैं यह सब पचड़ा भरा सवाल नहीं कर रहा। एक मामूली नागरिक हूं। सवाल नहीं पूछ सकता। बस जी में आया तो आपसे साझा कर रहा हूं कि क्या वाकई हमारा देश राष्ट्रीयता के संकट के दौर से गुजर रहा है! बस यूं ही पूछ रहा हूं, अन्यथा न लीजिएगा।( साभार

बिदेसिया)